तिजारा। देहरा तिजारा की पावन धरा पर भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज के 31वें मंगल चातुर्मास के अवसर पर चंद्र तीर्थ मंडपम् में धर्मसभा का आयोजन हुआ। मंगल प्रवचन में श्रद्धालुओं को अहिंसा, दया और करुणा के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया।
अहिंसा ही सच्चे धर्मात्मा की पहचान
आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज ने कहा कि दया धर्म का पालन करने वाला, अहिंसा को अपनाने वाला और सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखने वाला व्यक्ति ही श्रेष्ठ कहलाता है। जीवन में किसी भी जीव को दुःख या कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जो हिंसा करता है, वह हत्यारे की श्रेणी में आता है, जबकि हिंसा से दूर रहकर अहिंसा धर्म का पालन करने वाला ही सच्चा धर्मात्मा है। जैन धर्म प्रत्येक श्रमण संत और गृहस्थ श्रावक को अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
अहिंसा को जीवन में उतारना आवश्यक
आचार्य श्री ने कहा कि अहिंसा केवल कहने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का धर्म है। श्रमण संत स्वयं अहिंसा, करुणा और संयम का उत्कृष्ट आचरण करके समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने कहा कि जिस घर में अहिंसा धर्म का पालन होता है, वहां पुण्य का निवास होता है। व्यक्ति को अपने व्यवहार और आचरण में जीव मात्र के प्रति दया एवं करुणा का भाव रखना चाहिए।
धर्मसभा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
धर्मसभा में मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन (पटेल), आदिश्वर जैन, पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र जैन, मीनू जैन, राशि जैन, निशु जैन, संतरा जैन एवं अर्चना जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
अहिंसा का संदेश पहुंच रहा जन-जन तक
आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज के 31वें मंगल चातुर्मास के माध्यम से तिजारा की पावन भूमि से अहिंसा, दया, करुणा और संयम का संदेश जन-जन तक पहुंच रहा है। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के मंगल प्रवचन का श्रवण कर अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की।



