इंदौर। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के आशीर्वाद और श्रमण मुनिश्री सुव्रत सागर जी द्वारा संपादित ग्रंथ भक्तामर और भारतीय चित्रांकन का लेखन नर्मदाप्रसाद उपाध्याय ने किया है। इसके पूण्यार्जक टीके मंजु वेद और महेंद्र लुहाडिया है। इसका प्रकाशन श्रमण संस्कृति सेवा ट्रस्ट ने किया है। इसका विमोचन भव्य एवं गरिमामय कार्यक्रम में पवन गोधा दिल्ली, शरद कासलीवाल महासभा पदाधिकारी शरद जैन महालक्ष्मी चैनल, देवेंद्र सिंघई, वास्तुविद केदार जैन ग्वालियर एवं आचार्य श्रीजी के सान्निध्य में ऋषभ विहार दिल्ली में हुआ।
ग्रंथ निशुल्क उपलब्ध
सभी स्वाध्याय प्रेमियों के लिये ग्रंथ निःशुल्क उपलब्ध है। इस दिन आचार्य श्री जी का पूरा प्रवचन ग्रंथ की विषय वस्तु पर केंद्रित रहा टीके मंजू वेद ने बताया कि सनातन संस्कृति के विद्वान द्वारा रचित ग्रन्थ भक्तामर शोध कर्ताओं के लिये एक अमूल्य धरोहर सिद्ध होगा
इस कला ने लोक के रस से जीवन पाया
इस ग्रंथ के बारे में वरिष्ठ साहित्यकार और लेखक नर्मदाप्रसाद उपाध्याय ने कहा कि जब जैन कला और विशेष रूप से जैन चित्रांकन परंपरा को यदि देखें तो यह ज्ञात होता है कि इस कला ने लोक के रस से जीवन पाया और उसी के लिए यह समर्पित हो गई। जैन कला धर्म में समाहित रही, इसलिए कि वह उससे अलग हो ही नहीं सकती थी। जो सच्चे कलाकार थे, वे ही सच्चे साधु भी थे, इसलिए कि वे सहज थे। उनकी सौंदर्य दृष्टि कहीं विखंडित नहीं थी।
भारत की चित्रांकन परंपरा को अप्रतिहत रूप से जारी रखा
जैन कलाकार पूरी तरह धर्म के प्रति समर्पित कलाकार थे, इसलिए उन्होंने मध्यकाल में तमाम तरह के प्रतिबंधों के बीच भी भारतीय कला की ज्योति को जलाकर रखा। यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि जैन चित्रांकन परंपरा को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने भारत की चित्रांकन परंपरा को अप्रतिहत रूप से जारी रखा। इस बात की केवल कल्पना ही की जा सकती है कि मुसलमान शासकों के द्वारा किए गए निरंतर ध्वंस और संहार के बीच उसने किस प्रकार अपनी अस्मिता बचाए रखी होगी और किस तरह भारतीय चित्रांकन की इस विरासत को सहेज कर उसे विकसित किया होगा।
भक्तामर स्तोत्र किसी एक सम्प्रदाय का आराधन काव्य नहीं है
आराधना या स्तवन हृदय की देन है। इनकी अभिव्यक्ति मुख से होती हुई अवश्य दिखाई देती है, किन्तु इनका स्रोत हृदय होता है। हृदय से अभिव्यक्त होने वाली यह आराधना इतनी निर्मल होती है कि इसकी प्रवहमान धारा में समूची मनुष्यता स्नान करती है। इस धारा को प्रवहमान करते हैं; वे आचार्य जिनका जन्म ही इस पृथ्वी पर समूची मनुष्यता को तार देने के लिए होता है। आचार्य मानतुंग ऐसे ही आचार्य के रूप में लगभग 7वीं सदी में इस धरा पर जन्मे थे, उन्होंने भक्तामर स्तोत्र की ऐसी धारा प्रवाहित की जिसमें आज भी स्नान कर मनुष्यता धन्य होती है। भक्तामर स्तोत्र किसी एक सम्प्रदाय का आराधन काव्य नहीं है, बल्कि यह मनुष्य मात्र की अनमोल धरोहर है। -ःनर्मदा प्रसाद उपाध्याय’’



