सिद्ध चक्र विधान में पूजन से सिद्ध भगवान का होता है गुणानुवाद : अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने चढ़ाए जाने वाले द्रव्यों की विशद व्याख्या की

श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान आराधना महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन इंदौर के श्री महावीर दिगंबर मंदिर परिवहन नगर में 7 से 14 दिसंबर तक आयोजित किया गया है। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले द्रव्य किस आशय से चढ़ाए जाते हैं, उन गुणों के बारे में सरल भाषा में बताया। इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया इंदौर की यह खबर...
परिवहन नगर (इंदौर)। श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान आराधना महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन इंदौर के श्री महावीर दिगंबर मंदिर परिवहन नगर में 7 से 14 दिसंबर तक आयोजित किया गया है। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने पूजन के दौरान चढ़ाए जाने वाले द्रव्य किस आशय से चढ़ाए जाते हैं, उन गुणों के बारे में सरल भाषा में बताया। सिद्धचक्र विधान के पूजन में सिद्ध भगवान का गुणागुवाद किया जाता है, उनकी प्रशंसा की जाती है। विवेचना करते हुए बताया अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने कहा कि जो संसार के बंधनों से छूट गए हैं, जिनमें अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख और अनंत वीर्य प्रकट हो गए हैं, जो द्रव्य कर्म, भाव कर्म, और नौकर्म से सर्वथा रहित हो गए हैं, उन्हें सिद्ध कहते हैं। मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आगे बताया कि ऐसे अनंत सिद्ध परमात्मा लोक के अग्रभाग में विराजित हैं। सिद्ध भगवान का समुदाय ही सिद्धचक्र कहलाता है। इस सिद्धचक्र विधान में सिद्ध दशा प्रकट करने का विधान अर्थात उपाय बताते हुए सिद्धों का गुणानुवाद किया गया है। ज्ञानी का परम लक्ष्य पूर्ण सुख प्रकट करना है अर्थ अतः उसके हृदय में पूर्ण सुखी अरिहंत और सिद्ध परमेष्ठी तथा पूर्ण सुख के आराधक आचार्य, उपाध्याय, साधु, परमेष्ठि और पूर्ण सुख का मार्ग बताने वाली जिनवाणी के प्रति भक्ति भाव होना स्वाभाविक है। इसलिए सिद्ध भगवन के गुणानुवाद के माध्यम से अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क रहते हुए अशुभ भावों से सहज बच जाते हैं। सिद्ध चक्र विधान से अनेक रोग शारीरिक रोग तो दूर होते ही हैं किंतु, जन्म मरण का रोग भी दूर होता है। आत्मा के रोग राग द्वेष विकारी भाव भी सिद्ध भगवान की आराधना से दूर होते हैं।
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