मुरैना। शहर के बड़े जैन मंदिर में आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने प्रवचन में ध्वनि की शक्ति को समझाते हुए कहा कि ध्वनि का हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जो बोलते हैं, जिस भाव से बोलते हैं और जिस प्रकार बोलते हैं, उसका प्रभाव केवल सामने वाले व्यक्ति पर ही नहीं, बल्कि स्वयं हमारे मन और शरीर पर भी पड़ता है। इसलिए वाणी का प्रयोग हमेशा सोच-समझकर और मधुरता के साथ करना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि हमारे धार्मिक जीवन में भी ध्वनि का विशेष महत्व है। णमोकार महामंत्र का जाप, मंत्रों का उच्चारण, स्तुति, स्वाध्याय और जिनवाणी का श्रवण मन को शांत करने और धार्मिक भावों को जागृत करने में सहायक होते हैं। यदि मंत्र का उच्चारण केवल शब्दों के रूप में न करके श्रद्धा, एकाग्रता और शुद्ध भाव के साथ किया जाए तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव और गहरा हो जाता है।

घंटा ध्वनि एकाग्रता का माध्यम

उन्होंने मंदिर की घंटाध्वनि का उदाहरण देते हुए कहा कि जिनालय में प्रवेश करते समय घंटा बजाने की परंपरा के पीछे भी एक भाव है। घंटी की ध्वनि आसपास के वातावरण में फैलती है और व्यक्ति के चंचल मन को एक क्षण के लिए बाहरी गतिविधियों से हटाकर जिनेन्द्र भगवान की ओर केंद्रित करती है। घंटा ध्वनि मानो संसार की भागदौड़ में उलझे मनुष्य को पुकारकर कहती है कि अब कुछ क्षण अपने भीतर झांकने का समय है।

आत्म जागरण की ध्वनि पैदा होगी

आचार्यश्री ने कहा कि मंदिर की घंटी बजाकर यदि हम फिर उसी क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को लेकर बाहर निकल आए तो घंटाध्वनि का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। घंटा हमें केवल आवाज सुनाने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर चेतना की घंटी बजाने के लिए प्रेरित करता है। जब मंदिर की घंटाध्वनि के साथ हमारे भीतर भी आत्म जागरण की ध्वनि पैदा होगी, तभी धर्म हमारे जीवन में सार्थक होगा।

विचारों में शुद्धता और व्यवहार में विनय हो

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अपनी वाणी को भी मंदिर की घंटाध्वनि की तरह बनाएं- ऐसी वाणी जो किसी को दुखी न करे, किसी के मन में अशांति न पैदा करे और सुनने वाले के भीतर सद्भावना एवं सकारात्मकता जागृत करे। मधुर वाणी स्वयं के लिए भी शांति का कारण बनती है और समाज में भी प्रेम एवं सौहार्द का वातावरण निर्मित करती है। आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी वाणी, विचार और व्यवहार तीनों को पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। वाणी में मिठास, विचारों में शुद्धता और व्यवहार में विनय होगी तो व्यक्ति स्वयं भी शांत रहेगा और उसके संपर्क में आने वाले लोगों को भी शांति मिलेगी। यही ध्वनि की शक्ति को समझने और उसे जीवन में सही दिशा देने का वास्तविक उद्देश्य है।

विनय का ध्यान रखना चाहिए

मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार हम भगवान के दर्शन और भक्ति के लिए मंदिर जाते हैं, उसी प्रकार देवगण भी जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और दर्शन के लिए आते हैं। इसलिए मंदिर, पर्वत, पहाड़, गुफा, कुआं अथवा तालाब जैसे धार्मिक एवं पवित्र स्थानों में प्रवेश करते समय मर्यादा और विनय का ध्यान रखना चाहिए। ऐसे स्थानों में प्रवेश करते समय 'णिस्सहि-णिस्सहि' का उच्चारण करना जैन परंपरा में विनय एवं मर्यादा का प्रतीक है।

एक-एक पीतल का बड़ा घंटा देने की घोषणा

उन्होंने मंदिर में घंटे की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिनालय में घंटा होना चाहिए। घंटाध्वनि वातावरण में सकारात्मकता का संचार करती है और श्रद्धालु के चंचल मन को एकाग्र करने में सहायक होती है। जब घंटा ध्वनि के साथ भगवान के प्रति भक्ति और आत्मशुद्धि का भाव जुड़ता है, तब वही ध्वनि साधक के लिए आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बन जाती है। घंटा ध्वनि का वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उसकी ध्वनि से मन एकाग्र होकर निर्मल भावों की ओर अग्रसर होता है। आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचनों की प्रेरणा से प्रभावित होकर प्रेमचंद जैन, राजेंद्र जैन रज्जु एवं पंकज जैन मेडिकल ने तुरंत ही एक-एक पीतल का बड़ा घंटा देने की घोषणा की।