मुरैना। शहर में चातुर्मासरत ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में रत्नकरण्ड श्रावकाचार पर चल रही प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सच्चे गुरु के बिना आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। गुरु लौकिक जीवन में भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं और पारलौकिक जीवन में भी आत्मा को सही दिशा प्रदान करते हैं। अरिहंत और सिद्ध परम गुरु हैं तथा पंच परमेष्ठी हमारे लिए परम वंदनीय हैं।

वे स्वयं आचरण के माध्यम से धर्म का स्वरूप समझाते

आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन में ज्ञान तो अनेक माध्यमों से प्राप्त कर सकता है, लेकिन उस ज्ञान को जीवन में उतारने की कला सच्चे गुरु के सान्निध्य से ही आती है। गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं होते, बल्कि वे स्वयं आचरण के माध्यम से धर्म का स्वरूप समझाते हैं। गुरु का एक वचन, एक संकेत और एक आदर्श भी जीव के जीवन की दिशा बदल सकता है।

गुरु के प्रति श्रद्धा और विनय जरूरी

गुरु की महिमा बताते हुए आचार्यश्री ने एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि एक विद्यार्थी प्रतिदिन अपने गुरु के चरण स्पर्श करता था। एक दिन गुरु ने उसे चरण स्पर्श करने से मना कर दिया। विद्यार्थी ने इसका कारण पूछा तो गुरु ने कहा कि मेरे जीवन में एक बुराई थी, लेकिन तुम्हारी गुरु के प्रति श्रद्धा और विनय को देखकर मैंने उस बुराई को छोड़ दिया। आचार्यश्री ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि सच्ची गुरु-भक्ति केवल गुरु का सम्मान करना नहीं है, बल्कि गुरु के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना है। शिष्य की श्रद्धा गुरु के भीतर भी श्रेष्ठ भावों को जागृत कर सकती है और गुरु का सान्निध्य शिष्य के जीवन में आत्म परिवर्तन ला सकता है। इसलिए गुरु के प्रति विनय, श्रद्धा और समर्पण रखना चाहिए।

संसार में धन, पद और प्रतिष्ठा क्षणिक

उन्होंने कहा कि आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अनेक लोगों का मार्गदर्शन लेता है, लेकिन आत्मा के कल्याण के लिए सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलना भूल जाता है। संसार में धन, पद और प्रतिष्ठा क्षणिक हैं, जबकि आत्मकल्याण ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। गुरु हमें इसी शाश्वत लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।

ब्रह्ममुहूर्त में जागरण से दिन की शुरुआत कर धर्ममय बनाएं: मुनिश्री उपशान्तसागर

धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि सोने से पहले मन में शुभ संकल्प होना चाहिए कि प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर जिनालय जाना है, भगवान का अभिषेक करना है और जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना करनी है। रात में सोते समय जैसा भाव रहता है, उसका प्रभाव हमारे अगले दिन की दिनचर्या पर भी पड़ता है। मुनिश्री ने कहा कि आज हमारी दिनचर्या ही उल्टी होती जा रही है। रात में देर तक जागना और दिन में सोना हमारी आदत बनती जा रही है। उन्होंने प्रेरक शैली में कहा कि यदि मनुष्य की दिनचर्या ही उल्टी हो जाए तो उसका जीवन भी उल्लू की तरह उल्टा होता चला जाता है। इसलिए जीवन में अनुशासन और धार्मिक दिनचर्या को अपनाना आवश्यक है।

चौबीसों तीर्थंकर भगवान का स्मरण और दर्शन-भाव करें

ब्रह्ममुहूर्त में जागना केवल शरीर को जगाना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना को धर्म की ओर जगाना है। प्रातःकाल का समय मन की शुद्धि और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत उपयोगी है। सुबह उठते ही संसार की चिंताओं में पड़ने के बजाय जिनेन्द्र भगवान का स्मरण करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि प्रातः जागते समय दोनों हथेलियों को जोड़कर उन्हें सिद्धशिला के समान मानते हुए चौबीसों तीर्थंकर भगवान का स्मरण और दर्शन-भाव करना चाहिए। दिन की पहली स्मृति यदि भगवान की होगी तो दिनभर के कार्यों में भी धर्म और संयम की प्रेरणा बनी रहेगी।

जिनेन्द्र स्मरण, गुरु वंदना हो दिन की शुरूआत

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि मंदिर जाना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने की साधना है। अभिषेक-पूजन के माध्यम से हम भगवान के गुणों का स्मरण करते हैं और अपने भीतर भी उन गुणों को विकसित करने का संकल्प लेते हैं। दिन की शुरुआत जिनेन्द्र स्मरण, गुरु वंदना और शुभ भावों से होगी तो जीवन की दिशा भी धीरे-धीरे आत्मकल्याण की ओर बढ़ेगी। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री एवं मुनिश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया। विद्वत नवनीत शास्त्री ने धर्मसभा का संचालन करते हुए बताया कि संध्याकालीन धर्मसभा में प्रश्न मंच के तहत प्रथम पुरस्कार अल्पना जैन एवं रजत जैन को प्राप्त हुआ। उपस्थित साधर्मी बंधुओं ने गुरु भक्ति एवं आरती में भक्ति भाव व श्रद्धा के साथ सहभागिता प्रदान की।