इंदौर। नेमिनगर जैन कॉलोनी में इन दिनों वास्तव में ज्ञान की अमोघ धारा बह रही है। जीवन मूल्यों के साथ आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए स्वआत्मानुभव के लिए आचार्य श्री सुनीलसागर जी की तेजस्वी प्रखर वाणी से सन्मति समवशरण में उपस्थित श्रावक-श्राविकाएं और गुरु भक्त लाभान्वित हो रहे हैं। गुरुवार को यहां सन्मति समवशरण में आचार्य श्री सुनीलसागरजी ने अपने प्रवचन में कहा कि दुनिया जैसी है, उसे वैसी ही रहने दीजिए। कुछ पल के लिए बाहर की परिस्थितियों को बदलने के बजाय अपने भीतर के भावों को बदलकर देखिए क्योंकि, जब भाव बदलते हैं तो दृष्टि बदलती है, आचरण बदलता है और धीरे-धीरे जीवन की दिशा भी बदल जाती है।
हर जीव में भाव की रहती है निरंतरता
पंच परावर्तन में सबसे महत्वपूर्ण है भाव परावर्तन। मनुष्य के भीतर भाव न हों, ऐसा संभव नहीं। हर जीव के अंदर किसी न किसी प्रकार के भाव निरंतर चलते रहते हैं। किसी के भीतर क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों के भाव होते हैं, तो किसी के भीतर विषय-वासनाओं के भाव। लेकिन सौभाग्यशाली वे जीव हैं, जिनके भीतर पूजा, आराधना, धर्म, ध्यान और आत्मकल्याण के भाव जागृत होते हैं।
भीतर का परिवर्तन ही परमात्मा बनने की दिशा तय करता है
सिर्फ भाव बनना पर्याप्त नहीं है, भाव कैसे बन रहे हैं, यह देखना भी जरूरी है। क्योंकि अशुद्ध भाव आत्मा को संसार की ओर ले जाते हैं और शुद्ध भाव आत्मा को परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। इसलिए संसार को बदलने की चिंता छोड़कर एक बार अपने भीतर झांककर देखिए-मेरे भाव किस दिशा में जा रहे हैं? क्योंकि, जिस दिन भावों का परिवर्तन शुरू हो गया, उसी दिन आत्मा के परिवर्तन की शुरुआत हो जाएगी। यही भीतर का परिवर्तन एक दिन जीव को संसारी से सिद्ध और आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में ले जाता है।



