कावनूर (तमिलनाडु)। समय के थपेड़ों और लंबे समय तक उपेक्षा के कारण 12वीं शताब्दी का एक प्राचीन जिनालय पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो गया था। मंदिर परिसर में घास-फूस उग आई थी और उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि वहां दोबारा भव्य जिनालय आकार लेगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल था लेकिन, भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा, समर्पण और प्राचीन जैन धरोहर के संरक्षण के संकल्प ने असंभव से दिखने वाले इस कार्य को संभव कर दिया। दक्षिण भारत के भामाशाह के रूप में प्रतिष्ठित सरिता एमके जैन के परिवार ने आर्थिक सहयोग देकर तमिलनाडु में अरक्कोणम के निकट कावनूर स्थित अतिशयकारी श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान के प्राचीन जिनालय का जीर्णोद्धार कराया। प्राचीनता की गरिमा को बनाए रखते हुए पत्थरों से निर्मित यह जिनालय आज जैन धर्म की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की प्रेरक मिसाल बन गया है।

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खंडहर देख लिया पुनरुद्धार का संकल्प

प्राचीन जिनालय की जानकारी मिलने पर एमके जैन एवं सरिता जैन ने यहां पहुंचकर भगवान के दर्शन किए और मंदिर की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्ता को निकट से अनुभव किया। पूरी तरह खंडित मंदिर और परिसर में उगी घास-फूस को देखकर उनके मन में इस अमूल्य धरोहर को पुनर्जीवित करने की भावना जागृत हुई। उन्होंने जिनालय के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। यह केवल एक मंदिर के निर्माण का निर्णय नहीं था, बल्कि जैन धर्म की प्राचीन परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक चेतना को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की पहल थी। परिवार ने आर्थिक सहयोग देकर मंदिर को पुनः भव्य स्वरूप प्रदान कराया। विशेष बात यह रही कि प्राचीनता की गरिमा और पारंपरिक स्थापत्य शैली का सम्मान करते हुए पत्थरों से जिनालय का निर्माण कराया गया। इससे खंडहर हो चुकी धरोहर को नया जीवन मिला और श्रद्धालुओं के लिए भगवान के दर्शन एवं आराधना का मार्ग फिर से प्रशस्त हुआ।

300 से अधिक श्रद्धालुओं की मौजूदगी में पंचकल्याणक महोत्सव

जिनालय के पुनरुद्धार के बाद विगत दिनों डॉ. स्वस्ति श्री धवलकीर्ति भट्टारक भट्टाचार्य महास्वामीजी के पावन सान्निध्य में एक दिवसीय पंचकल्याणक महोत्सव विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुआ। इस अवसर पर एमके जैन स्वयं उपस्थित रहे। महोत्सव में 300 से अधिक जैन श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आयोजन श्रद्धा, भक्ति और धर्मप्रभावना का संगम बना। श्रद्धालुओं ने भगवान श्री सुपार्श्वनाथ के दर्शन कर भक्तिभाव से वंदन किया। पंचकल्याणक महोत्सव के माध्यम से जिनालय की धार्मिक महत्ता और अधिक प्रखर हुई तथा लंबे समय से उपेक्षित रही इस प्राचीन धरोहर में एक बार फिर धार्मिक गतिविधियों का वातावरण बना।

भगवान की प्रतिमा की महिमा से जुड़ी है जनश्रुति

कावनूर के इस प्राचीन जिनालय की महिमा से जुड़ी एक जनश्रुति भी पीढ़ियों से श्रद्धापूर्वक सुनाई जाती है। कहा जाता है कि किसी समय कुछ लोग यहां विराजमान भगवान श्री सुपार्श्वनाथ की प्रतिमा को चुराकर विदेश ले जाना चाहते थे। वे प्रतिमा को जहाज पर रखकर अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से जहाज आगे नहीं बढ़ पाया। काफी प्रयासों के बाद भी जब जहाज अपनी जगह से नहीं हिला तब एक वृद्ध व्यक्ति की वाणी सुनाई दी। उसने बताया कि जहाज में भगवान की प्रतिमा रखी है और जब तक उसे नीचे नहीं उतारा जाएगा तब तक जहाज आगे नहीं बढ़ सकेगा। यह सुनकर वहां मौजूद लोग आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें समझ नहीं आया कि उस वृद्ध व्यक्ति को जहाज में रखी पत्थर की प्रतिमा के बारे में कैसे पता चला। जनश्रुति के अनुसार प्रतिमा को नीचे उतारते ही जहाज आगे बढ़ने लगा। इस घटना से प्रभावित होकर प्रतिमा को ले जाने वाला व्यक्ति उसे वापस उसी स्थान पर छोड़ गया, जहां भगवान मूल रूप से विराजमान थे। श्रद्धालु इस प्रसंग को भगवान श्री सुपार्श्वनाथ की अतिशयकारी महिमा और प्रतिमा के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक मानते हैं।

जीर्णोद्धार में कई लोगों का रहा योगदान

इस प्राचीन जिनालय के जीर्णोद्धार में प्रारंभ से लेकर विभिन्न चरणों तक कई लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अरिहंतगिरि क्षेत्र से प्रतिष्ठाचार्य वसंत शास्त्री, एस.वी. सुरेश जैन, शिखमणि एवं बी.अशोक जैन ने कई बार स्थल पर पहुंचकर कार्यभार संभाला और नेतृत्व प्रदान किया। उनके योगदान से जिनालय के पुनरुद्धार का कार्य आगे बढ़ा।

जैन संस्कृति के संरक्षण की प्रेरक मिसाल

आज जब आधुनिकता की दौड़ में अनेक प्राचीन स्मारक और धार्मिक धरोहरें उपेक्षा का शिकार हो रही हैं, ऐसे समय में एम.के. जैन, सरिता एमके जैन एवं उनके परिवार का यह कार्य विशेष महत्व रखता है। दक्षिण भारत के विभिन्न मंदिरों में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में सहयोग देने वाला यह परिवार अपनी श्रद्धा और समर्पण से जैन विरासत के संरक्षण में योगदान दे रहा है।कावनूर के जिनालय का पुनरुद्धार केवल आर्थिक सहयोग से मंदिर बनवाने तक सीमित नहीं है। यह धार्मिक निष्ठा, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और आध्यात्मिक समर्पण का परिचायक है। प्राचीन पत्थरों और पारंपरिक स्थापत्य शैली को महत्व देते हुए एक पूरी तरह खंडित जिनालय को फिर से भव्य स्वरूप देना अपने आप में महत्वपूर्ण पहल है।

यह जिनालय जैन समाज का गौरव

यह कार्य समाज को संदेश देता है कि प्राचीन धरोहरें केवल अतीत की स्मृतियां नहीं, बल्कि हमारी आस्था, संस्कृति और पहचान की जीवंत आधारशिलाएं हैं। इनका संरक्षण वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें। कावनूर की पावन भूमि पर स्थित अतिशयकारी श्री 1008 सुपार्श्वनाथ भगवान का यह जिनालय जैन समाज के लिए गौरव का विषय है। सरिता एमके जैन के परिवार ने जिस श्रद्धा, उदारता और संकल्प के साथ इस पुनीत कार्य को साकार किया है, वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। ऐसे कार्यों का महत्व वर्तमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धर्म, संस्कृति और इतिहास की सेवा के रूप में लंबे समय तक स्मरण किया जाता है। भगवान श्री सुपार्श्वनाथ के चरणों में कोटि-कोटि वंदन। यह पावन जिनालय अनंत काल तक धर्म, शांति, अहिंसा और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बना रहे तथा सरिता एमके जैन एवं उनके परिवार पर भगवान का मंगल आशीर्वाद बना रहे।