ये विचार रविवार को इन्दौर के श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर प्रांगण में एक धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए आचार्य पुष्पदंत सागर मुनिमहाराज के शिष्य अचार्य प्रज्ञासागर जी मुनिमहाराज ने अपने प्रवचनों में प्रस्तुत किये। इस दौरान आचार्यश्री ने कहा कि,- "वे श्रवणबेलगोला के महामस्तकाभिषेक के अवसर पर गोम्मटेश बाहुबली गये थे। वहां 380 जैन साधु थे। वहां किसी पंथ की विचारधारा का कोई भेदभाव प्रतीत नहीं हुआ। जो जहां विधि मिली वहां आहार के लिए चले गये। बीसपंथी साधु तेरापंथी चैके में, तेरापंथी साधु बीसपंथी चैके में आहार के लिए चले जाते थे। कहीं कोई भेद-भाव दृष्टिगत नहीं हुआ। उसी तरह देश में सभी पंथों, उपपंथों के साधुओं को करना चाहिए।“
इस दौरान उन्होंने कहा,- “जब साधु ही भाईचारे का अनुपालन नहीं करेंगे तब शिष्यों-श्रावकों, समाज को कैसे भाईचारे का उपदेश दे पायेंगे। साधु एक हैं तो समाज एक है। साधुओं में दुराव है, तो समाज में दुराव होगा होगा। समाज को व्यक्तिगत रूप से भी सोचना होगा कि साधु संस्था के दुराव में कहीं उनकी संलग्नता तो नहीं है। विद्वत् परिषद् के महामंत्री डॉ. महेन्द्रकुमर जैन ‘मनुज’ ने बताया कि, आचार्य प्रज्ञासागर मुनि महाराज से पूर्व आचार्य विशुद्धसागर मुनि महाराज के शिष्य आदित्य सागर मुनि महाराज ने इसी धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि, “गुरुसान्निध्य में कुछ बात और थी और अब बिना गुरु के वे तीन साधुओं के साथ भ्रमण कर रहे हैं, यह बात अलग है। किन्तु आचार्य प्रज्ञासागर मुनि महाराज से मिलने के उपरान्त इनसे भी हमें अपने गुरु के समतुल्य स्नेह मिल रहा है।“ उक्त दोनों प्रवचनकर्ता गुरुवर्यों ने कहा कि, मिलन दूध में पानी जैसा होना चाहिए। जब दोनों मिलें तो एकमेक हो जायें।
ज्ञातव्य है कि आचार्य प्रज्ञासागर जी और मुनि श्री आदित्यसागर जी ससंघ का प्रवास इन्दौर की विभिन्न कॉलोनियों में चल रहा है। रविवार को दोनों संघों का मिलन शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर मल्हारगंज में हुआ। इसी अवसर पर दोनों संघों के प्रमुखों ने जनता को अपने प्रवचनों द्वारा संबोधित किया।




