इंदौर। धर्म समाज संस्कृति और जीव दया को समर्पित मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज ने शनिवार को दलालबाग मे विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपनी पीयूष देशना में कहा कि मनुष्य जीवन में ऊँचाइयों को छूना चाहता है, लेकिन उसे यह समझना होगा कि ऊँचा वही उठ सकता है जिसकी जड़ें मजबूत हों। पेड़ पहले अपनी जड़ें धरती में गहरी करता है, तभी वह आकाश की ओर बढ़ता है। उसी प्रकार जीवन में बाहरी सफलता से पहले अंतरात्मा की नींव और मन की शांति मजबूत करना आवश्यक है।महाराज श्री ने कहा कि आज मनुष्य के पास परिवार, धन, साधन, सुविधाएं, समाज, भगवान और गुरु सब कुछ है, फिर भी मन अशांत है। सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन क्रोध, मान, माया और लोभ भी बढ़ते जा रहे हैं। हम अपनी खुशी दूसरों की प्रशंसा और बाहरी दिखावे से जोड़ बैठे हैं, जबकि वास्तविक धर्म भीतर उतरने और स्वयं को पहचानने का नाम है।
घृणा मत करो, उसे खाद बनाना सीखो
मुनिश्री ने कहा कि हमारी शांति कितनी कमजोर है, इसका पता छोटी-सी घटना से चल जाता है। सुबह हम प्रसन्न होकर उठते हैं, लेकिन घर में टूथब्रश जैसी छोटी वस्तु टूट जाए तो हमारा क्रोध पूरे वातावरण को बदल देता है। यदि इतनी छोटी बात हमारी शांति छीन सकती है, तो हमें अपनी शांति की वास्तविक मजबूती पर विचार करना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि पंचम काल में भारतभूमि, जैन कुल, भगवान, गुरु और धर्म मिलना अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। इसलिए बार-बार अपने मन से पूछिए और क्या चाहिए?” मन की भूख तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक मन स्वयं तृप्त होना नहीं सीखता। महाराज श्री ने जीवन की कठिनाइयों को देखने की दृष्टि बदलने का संदेश देते हुए कहा कि बुराई से घृणा मत करो, उसे खाद बनाना सीखो। जिस प्रकार किसान गंदगी और कचरे को खाद बनाकर अच्छी फसल पैदा करता है, उसी प्रकार जीवन में आने वाला विरोध, अपमान, कठिनाई और संकट हमारी आत्मिक उन्नति की खाद बन सकता है। मानतुंग आचार्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि विपरीत परिस्थितियां भी महान साधना का कारण बन सकती हैं।
हर परिस्थिति से सीखने की दृष्टि विकसित करें
उन्होंने कहा कि जीवन में जो मिला है, उसके लिए आभार व्यक्त करना सीखिए। बाजरे की रोटी मिले तो उसे छोटा मत समझिए, झोपड़ी मिली है तो उसका धन्यवाद कीजिए, साइकिल या पुरानी गाड़ी मिली है तो उसका अपमान मत कीजिए। जो मिला है, पहले उसके लिए खुश होना सीखिए। महाराज श्री ने चेताया कि दूसरे के अभिशाप से ज्यादा खतरनाक है स्वयं अपने जीवन को कोसना कि मेरी किस्मत खराब है, मेरे साथ ही बुरा होता है ऐसे विचार व्यक्ति को भीतर से कमजोर करते हैं। इसके स्थान पर भाव होना चाहिए मेरे पास बहुत कुछ है, मुझे भगवान मिले, गुरु मिले, धर्म मिला और मैं जो मिला है उसके लिए आभारी हूँ। मुनि श्री कहा कि सच्चा धर्म केवल पाने में नहीं, बल्कि छोड़ने के बाद भी आभार रखने में है। जिसने हमें कुछ दिया, जिसने हमारा साथ दिया, जिसने हमें कठिनाई दी—हर परिस्थिति से कुछ सीखने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए।
धर्मसभा में यह समाजजन रहे मौजूद
प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में प्रमुख रूप से बालब्रह्मचारी पारस भैया चक्रवर्ती अध्यक्ष सपना मनीष गोधा नवीन गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, महामंत्री हर्ष जैन, डॉ जैनेन्द्र जैन संजय पाटोदी, ,श्रुत जैन, मयंक जैन, विकास पाटोदी, कमल अग्रवाल, मुक्ता जैन, सोनाली बगड़िया,सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।




