सीकर। पारस भवन दंग की नसिया में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज संघ सहित विराजित हैं। उनके सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः से शाम तक धार्मिक अनुष्ठान एवं स्वाध्याय के आयोजन हो रहे हैं। 9 अगस्त रविवार से धार्मिक संस्कार शिविर का शुभारंभ आचार्य श्री के मंगलाचरण के साथ हुआ। शिविर में अनेक श्रावक-श्राविका, युवा, बालक-बालिकाएं सम्मिलित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।

19 अगस्त को अनेक दीक्षाओं का आयोजन

आगामी 19 अगस्त को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा अनेक दीक्षाएं प्रदान की जाएंगी। इनमें वर्तमान में कुछ क्षुल्लक एवं क्षुल्लिकाएं मुनि एवं आर्यिका पद की दीक्षा ग्रहण करेंगे। वहीं प्रतिमाधारी अणुव्रती दो श्रावकों एवं दो श्राविकाओं ने भी आचार्य श्री के समक्ष श्रीफल चढ़ाकर दीक्षा ग्रहण करने का निवेदन किया है।

साधु बनने के भाव रखें श्रावक

दोपहर के स्वाध्याय सत्र में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि श्रावक को भी साधु बनने के भाव रखना चाहिए। साधु पद के बिना आत्मकल्याण नहीं होता। जिस प्रकार जल में रहकर कमल निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार श्रावक को गृहस्थ अवस्था में रहते हुए विषयों में अधिक रमण नहीं करना चाहिए।

वैयावृति से अर्जित होता है पुण्य

आचार्य श्री ने कहा कि साधु की भक्ति, वैयावृति और सेवा मन, वचन एवं काय से करने पर 16 गुणों की प्राप्ति होती है। अरिहंत, सिद्ध, गुरु, सर्व साधु और धर्म की निर्मल भक्ति मन-वचन-काय से करनी चाहिए। साधु के हाथ-पैर दबाने और सेवा करने के साथ मन से उनके गुणों का स्मरण एवं गुणानुवाद करना भी वैयावृति है।

आहार-विहार में सहयोग भी सेवा

आचार्य श्री ने बताया कि साधुओं को आहार, अभय एवं औषधि दान देना, उनके आहार-विहार-निहार में सहयोगी बनना और उनके संयम की रक्षा करना भी वैयावृति है। साधु की आज्ञा का पालन करना तथा कषाय एवं इंद्रिय निग्रह में सहायता करना धर्म की प्रभावना में सहयोगी बनता है। यह धर्मदेशना आचार्य धर्मसागर सभागृह, पारस भवन दंग की नसिया, सीकर में आयोजित दोपहर कालीन स्वाध्याय सत्र में दी गई।

रात्रि में मौन से धर्म प्रभावना

डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि साधु का कर्तव्य है कि वह रात्रि में मौन रहकर धर्म की प्रभावना करे। रात्रि में बोलने से धर्म की प्रभावना नहीं होती। अपवाद स्वरूप साधु का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने या साधु की समाधि के समय मौन छोड़ा जा सकता है। शुद्ध उपयोग संयम एवं वैराग्य धारण के बिना संभव नहीं है।

मुनि श्री प्रभव सागर जी ने बताया मंगलाचरण का महत्व

प्रातःकालीन प्रवचन में मुनि श्री प्रभव सागर जी ने मंगलाचरण का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पहले मंगलाचरण किया जाता है, जिससे कार्य शांति एवं निर्विघ्न रूप से पूर्ण होता है। मंगलाचरण अर्थात पापों का नाश करने वाला भाव है। पुण्य से संत समागम की प्राप्ति होती है।

संत चलते-फिरते गंगा के समान

मुनि श्री प्रभव सागर जी ने कहा कि संत चलते-फिरते गंगा के समान हैं। वे संघ देते हैं, कुछ लेते नहीं हैं। जंगल में मुनिराज के रहने से वनस्पति और प्रकृति खिल उठती है तथा सभी ऋतुओं के फल-फूल आने लगते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे हमारे मन के भाव और परिणाम होते हैं, वैसे ही सामने वाले के मन में भी भाव उत्पन्न होते हैं।

आचार्य शांतिसागर जी का प्रसंग

मुनि श्री ने द्रोणागिरी का उदाहरण देते हुए बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के सामने एक बार रात्रि भर एक सिंह बैठा रहा। आचार्य श्री के परिणाम निर्मल थे और वे भक्ति में लीन रहे। सिंह भी पूरी रात शांत बैठा रहा। प्रातःकाल सिंह के वापस चले जाने के बाद आचार्य श्री पर्वत से नीचे आए और तब समाज को इस घटना की जानकारी हुई।

संयम की रक्षा ही सच्ची सेवा

धार्मिक संस्कार शिविर के माध्यम से श्रद्धालुओं को साधु-संतों की सेवा, वैयावृति, संयम की रक्षा, धर्म के प्रति समर्पण और आत्मकल्याण की प्रेरणा मिल रही है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में आगामी दीक्षा समारोह को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह बना हुआ है।