मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग हेतु विराजमान षष्ठम पट्टाचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन का मूल उद्देश्य संयममय जीवन के माध्यम से आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करना है। मोक्षमार्ग का वास्तविक आधार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चरित्र की अभिन्न एकता है।

तीनों तत्वों का समन्वय जरूरी

आचार्यश्री ने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, यदि उसमें सम्यक् श्रद्धा का अभाव हो। इसी प्रकार केवल श्रद्धा भी तब तक पूर्ण नहीं मानी जा सकती, जब तक उसका प्रतिफल श्रेष्ठ आचरण के रूप में दिखाई न दे। उत्तम चरित्र भी सम्यक् ज्ञान और सम्यक् दर्शन के बिना स्थायी नहीं रह सकता। इसलिए मोक्ष की सिद्धि तभी संभव है, जब श्रद्धा, ज्ञान और आचरण तीनों का समन्वित रूप से जीवन में समावेश हो।

तीन खम्भों वाले तराजू का दिया दृष्टांत

आचार्यश्री ने अपने प्रवचन को सरल एवं प्रेरक बनाने के लिए एक दृष्टांत सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बालक गल्ला मंडी में पहुंचा, जहां उसने तीन खम्भों वाला बड़ा तराजू देखा। दो खम्भों के सहारे वह उस पर चढ़ गया और उसे लगा कि तीसरे खम्भे का कोई विशेष महत्व नहीं है। बालक ने जैसे ही तीसरा खम्भा हटाया, पूरा तराजू अपना संतुलन खो बैठा और धराशायी हो गया। बालक भी उसके साथ नीचे गिर पड़ा।

त्रिवेणी पर टिका है मोक्षमार्ग

आचार्यश्री ने इस दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार तराजू का संतुलन तीनों खम्भों पर समान रूप से निर्भर होता है, उसी प्रकार आत्मा की आध्यात्मिक उन्नति भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की त्रिवेणी पर टिकी है। इनमें से किसी एक तत्व के कमजोर पड़ने पर साधना का संतुलन बिगड़ जाता है और मोक्षमार्ग बाधित हो सकता है।

पूजन सामग्री अमूल्य रत्नों के समान

धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशान्त सागर महाराज ने कहा कि जिनालय में पूजन केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि विवेक, विनय और सजगता का भी प्रतीक है। भगवान की पूजा करते समय प्रत्येक श्रद्धालु को विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि पूजन सामग्री का कोई भी द्रव्य भूमि पर न गिरे। उन्होंने कहा कि भगवान को समर्पित पवित्र द्रव्यों का अनादर आत्मा के लिए पापबंध का कारण बन सकता है। इसलिए प्रत्येक द्रव्य को पूर्ण श्रद्धा, विनम्रता और जागरूकता के साथ भगवान को अर्पित करना चाहिए।

रत्नों की तरह संभालें पूजन द्रव्य

मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी मुट्ठी में रखे अमूल्य रत्नों को अत्यंत सावधानी से संभालता है, ताकि एक भी रत्न नीचे न गिरने पाए, उसी प्रकार भगवान की पूजन सामग्री भी हमारे लिए रत्नों के समान अमूल्य और पूजनीय है।

प्रश्न मंच में बच्चों का उत्साहवर्धन

आचार्यश्री संघ के परम भक्त सुनील जैन ने बताया कि प्रतिदिन सायंकाल आयोजित होने वाला गुरुभक्ति एवं प्रश्न मंच कार्यक्रम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कार्यक्रम में आचार्यश्री धर्म, दर्शन एवं जैन सिद्धांतों से संबंधित प्रेरक एवं ज्ञानवर्धक प्रश्न पूछते हैं। सही उत्तर देने वाले बच्चों, युवाओं एवं श्रद्धालुओं को आचार्यश्री के करकमलों से पुरस्कार देकर उत्साहवर्धन किया जाता है।

नीतू जैन को मिला प्रथम पुरस्कार

सायंकालीन धर्मसभा में विद्यासागर पाठशाला की दीदी नीतू जैन को प्रथम पुरस्कार के लिए चयनित किया गया। आचार्यश्री के निर्देशानुसार मीडिया प्रभारी मनोज जैन नायक ने नीतू जैन को आकर्षक पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया।

नवनीत जैन शास्त्री ने किया संचालन

धर्मसभा का ओजस्वी, प्रभावशाली एवं गरिमामय संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। उनके सारगर्भित, मधुर एवं अनुशासित संचालन ने धर्मसभा को आध्यात्मिक भावों से ओत-प्रोत बनाए रखा और श्रद्धालुओं को प्रवचनों से आत्मीय रूप से जोड़े रखा। उपस्थित समाजजनों ने उनके प्रभावशाली संचालन की मुक्तकंठ से सराहना की।

धर्म, ज्ञान और आचरण का संदेश

धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशान्त सागर महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को धर्म के साथ ज्ञान, विवेक, विनय और श्रेष्ठ आचरण को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। वहीं प्रश्न मंच ने बच्चों एवं युवाओं में जैन दर्शन और सिद्धांतों के प्रति रुचि एवं ज्ञान बढ़ाने का कार्य किया।