ऋषभविहार दिल्ली। ऋषभविहार, दिल्ली में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्ध‌सागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में कहा कि जीवन में नैतिकता के साथ धर्म होना चाहिए। धर्म सुख-शांति का साधन है। धर्म ही मंगल है। धर्म ही उत्तम है। धर्म ही शरण है। धर्म ही मुक्ति का साधन है। पट्टाचार्य श्री विशुद्ध‌सागर जी महाराज के परम भक्त वैभव जैन बड़ामलहरा ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में उत्कर्ष, उन्नति, विकास प्राप्त करना है, तो मनोरंजन कम करो, मनोरंजन के साधनों से हटकर, अपने आपको आत्म-रंजन के साधनों में संलग्न करो। मनोरंजन से सुख नहीं मिलेगा, मनोरंजन से शांति नहीं मिलेगी। आत्म- रंजन ही सुख शांति और आनंद का परम द्वार है।

1003641062.jpg

जीवन जीने की दिव्य कलाएं

आचार्यश्री ने कहा कि श्रेष्ठ मनुष्य में 72 कलाएं होना चाहिए। श्रेष्ठ-नारी में 64 कलाएं होती हैं। सर्व-कलाओं में श्रेष्ठ कोई कला है तो उसका नाम ‘अध्यात्म- कला’ है। कुलवंत श्रेष्ठ-पुरुष भाषण- कला, ज्ञान-कला, व्यापार कला, युद्ध कला, शौर्य कला में निपुण होता है। कुलवंती, सुशील, शीलवान नारी लज्जागुण से संपन्न होती है। नारी में संबी संगीत कला, गीत कला, नृत्यकला, पाककला, सेवा आदि 64 कलाएं होती हैं।

घंटी से मंदिर का बोध

घंटी की आवाज से मंदिर का बोध होता है। बच्चों के संस्कारों से जनक-जननी का बोध होता है। विनय से व्यक्ति का बोध होता है। खान-पान से खानदान का परिचय होता है। बाह्य प्रवृत्ति से आंतरिक भावों का बोध होता है।

अच्छा सोचो, मीठा बोलो

देश, राष्ट्र, विश्व में सामंजस्य बनाना है तो अच्छा सोचो, मधुर बोलो। मधुर-भाषण से शत्रु भी मित्र बन जाता है। कटु वचन मत बोलो। कटु वचन शस्त्र से भी अधिक घातक पीड़ा दायक होता है। समीचीन सोचो, मधुर बोलो। दृष्टि को विशाल करो।