मुरैना। बड़े जैन मंदिर मुरैना में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने सम्यग्दर्शन के वास्तविक स्वरूप का तत्त्वपूर्ण विवेचन करते हुए कहा कि मोक्षमार्ग की आधारशिला सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन के बिना सम्यग्ज्ञान सार्थक नहीं होता और न ही सम्यक्चरित्र की सिद्धि संभव है।
देव-शास्त्र-गुरु में अटूट श्रद्धा
आचार्यश्री ने कहा कि मार्गप्रकाशक सच्चे देव, मार्गव्यवस्था सच्चा आगम यानी शास्त्र तथा मार्ग के अग्रदूत सच्चे गुरु हैं। इन तीनों के प्रति निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण ही वास्तविक सम्यग्दर्शन है। जिस जीव के हृदय में देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अविचल आस्था जागृत होती है, उसके जीवन की दिशा बदल जाती है और वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
वीतराग भगवान जीवन के आदर्श
आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे देव वे हैं, जिन्होंने राग-द्वेष, मोह और समस्त कषायों पर विजय प्राप्त कर आत्मस्वरूप को उपलब्ध किया है। ऐसे वीतराग भगवान केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि जीवन के आदर्श भी हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा शास्त्र वह है, जो जीव को मिथ्यात्व से निकालकर सत्य, अहिंसा, संयम और आत्मबोध की ओर ले जाए। वहीं सच्चे गुरु वे हैं, जो स्वयं शास्त्रानुकूल आचरण करते हुए साधक को मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।
बाहरी सुख नहीं, आत्मा में है वास्तविक आनंद
आचार्यश्री ने कहा कि आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, जबकि वास्तविक सुख आत्मा के भीतर विद्यमान है। जब तक जीव का विश्वास संसार, शरीर और विषय-भोगों में रहेगा, तब तक उसे स्थायी शांति प्राप्त नहीं होगी। जैसे ही श्रद्धा का केंद्र देव, शास्त्र और गुरु बनता है, वैसे ही जीवन में विवेक, संयम और आत्मचिंतन का प्रकाश फैलने लगता है।
प्रतिदिन देवदर्शन और आगम अध्ययन का आह्वान
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में प्रतिदिन देवदर्शन, आगम अध्ययन, गुरु वंदना तथा आत्मचिंतन को स्थान दें। यही साधना जीवन को सार्थक बनाती है और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु की त्रिवेणी आत्मोन्नति का शाश्वत आधार है, जो जीव को मोह, अज्ञान और कषायों से मुक्त कर परम शांति एवं मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।
छह आयतनों की रक्षा प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने जैन दर्शन के छह आयतनों की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा केवल मंदिर निर्माण या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म के मूल आधारों की सुरक्षा प्रत्येक श्रावक का प्रथम कर्तव्य है। मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने धन, आभूषण, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य संपत्ति की सावधानी से रक्षा करता है, उसी प्रकार धर्म के छह आयतनों की सुरक्षा भी श्रद्धा, निष्ठा और जागरूकता के साथ करनी चाहिए।
अरिहंत, सिद्ध, साधु, जिनधर्म, जिनागम और जिनालय
मुनिश्री ने बताया कि जैन धर्म के छह आयतन—अरिहंत, सिद्ध, साधु, जिनधर्म, जिनागम तथा जिनालय—आस्था, संस्कृति और मोक्षमार्ग के अमूल्य आधार हैं। इनका सम्मान, संरक्षण और संवर्धन प्रत्येक जैन का नैतिक एवं आध्यात्मिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि केवल वंदना कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन आयतनों के आदर्शों को जीवन में आत्मसात करना ही सच्ची धर्मआराधना है।
धर्म की मूल धरोहरों के संरक्षण का संदेश
मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि सांसारिक संपत्ति नष्ट होने पर पुनः प्राप्त की जा सकती है, लेकिन यदि धर्म की मूल धरोहरों की उपेक्षा हो जाए तो समाज अपनी आध्यात्मिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव खो सकता है। जब समाज अपने आयतनों के प्रति श्रद्धावान रहता है, तब धर्म की परंपरा अक्षुण्ण बनी रहती है, संस्कारों का संरक्षण होता है और आने वाली पीढ़ियां भी धर्म से जुड़ी रहती हैं। आयतनों के प्रति उदासीनता बढ़ने पर धार्मिक संस्कार, सिद्धांत और आध्यात्मिक चेतना धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है।



