अंबाह के परेड दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आर्यिका रत्न 105 श्री संगममती माताजी ने समयसार ग्रंथ के माध्यम से आत्मा के शुद्ध स्वरूप, समता, आत्मचिंतन और मोक्षमार्ग का महत्व समझाया। पढ़िए श्रीफल साथी अजय जैन की यह रिपोर्ट।
अंबाह। परेड दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान आर्यिका रत्न 105 श्री संगममती माताजी ने शनिवार को धर्मसभा में समयसार ग्रंथ पर आधारित प्रवचन देते हुए कहा कि समयसार आत्मा के शुद्ध स्वरूप का महान ग्रंथ है। इसका अध्ययन जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है और आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करता है।आत्मा का स्वरूप समझने का संदेश
माताजी ने कहा कि आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है। वह अनादि, अनंत, शुद्ध, बुद्ध एवं चैतन्य स्वरूप है। अज्ञानवश जीव स्वयं को शरीर और सांसारिक संबंधों से जोड़ लेता है, जबकि आत्मा इन सबसे भिन्न और स्वतंत्र है।
समता से प्रशस्त होता है मोक्षमार्गउन्होंने कहा कि समयसार का मूल संदेश है कि मनुष्य पहले स्वयं को पहचाने। जब तक जीव अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक वह मोह, ममता, राग और द्वेष के बंधनों में उलझा रहता है। आत्मबोध होने पर समता का भाव जागृत होता है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है।
स्वाध्याय और संयम का महत्वआर्यिका श्री ने कहा कि धन, वैभव, परिवार और शरीर सभी नश्वर हैं। इनके प्रति अत्यधिक आसक्ति ही दुःख का कारण बनती है। यदि व्यक्ति आत्मचिंतन, स्वाध्याय, संयम और तप को जीवन में स्थान देता है, तो उसका जीवन सार्थक बन जाता है।
धर्म ही आत्मा की ओर लौटने का मार्गमाताजी ने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन समयसार जैसे महान ग्रंथों का स्वाध्याय करने तथा क्षमा, करुणा, समता और अहिंसा के भाव विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आत्मा की ओर लौटना ही सच्चा धर्म है और यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभधर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने श्रद्धाभावपूर्वक माताजी के मंगल प्रवचनों का श्र QQवण कर आत्मचिंतन एवं धर्म साधना का संकल्प लिया।




