सागवाड़ा (राजस्थान)। “क्षमा वीरों का आभूषण है, लेकिन केवल बाहरी व्यवहार में शांत दिखाई देना उत्तम क्षमा नहीं है। अंतरंग में क्रोध, मान, माया और लोभ की कलुषता से मुक्त होकर भावों में निर्मलता, समता और सहिष्णुता लाना आवश्यक है।” वैज्ञानिक धर्माचार्य आचार्य श्री कनकनंदी गुरुदेव ने पर्युषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में यह संदेश दिया।

पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा स्थित विमलनाथ दिगंबर जैन मंदिर, आदिनाथ जिनालय, बाहुबली मंदिर, पारसनाथ जिनालय, अहिंसा नगर स्थित पारसनाथ जिनालय तथा वर्धमान सोसायटी के महावीर जिनालय में आचार्य श्री कनकनंदी गुरुदेव ससंघ के सान्निध्य में पर्युषण पर्व भक्तिभाव से मनाया जा रहा है।

अनाज से तैयार किया दशलक्षण विधान का मंडल

अहिंसा नगर स्थित पारसनाथ जिनालय में दशलक्षण धर्म विधान के लिए विभिन्न प्रकार के अनाज से आकर्षक मंडल तैयार किया गया। नवीन गंधकुटी में भगवान को विराजमान कर जुलूस निकाला गया।

आदिनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक किया गया। नित्य नियम पूजन के साथ दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की विशेष आराधना हुई।

‘केवल क्षमा नहीं, उत्तम क्षमा आवश्यक’

आचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने कहा कि केवल क्रोध नहीं करना ही उत्तम क्षमा की संपूर्णता नहीं है। क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्व जैसे अंतरंग विकारों के रहते वास्तविक क्षमा का गुण पूर्ण रूप से प्रकट नहीं होता।

उन्होंने कहा कि अंतरंग में कषाय हों और बाहर क्षमा का प्रदर्शन किया जाए तो वह वास्तविक क्षमा नहीं है। क्रोध के अभाव और भावों की निर्मलता से क्षमा का गुण प्रकट होता है।

भगवान राम के प्रसंग से समझाया क्षमा और न्याय का अंतर

आचार्यश्री ने भगवान राम का उदाहरण देते हुए कहा कि वे क्षमावान थे और उन्होंने बार-बार शांति एवं समझौते का संदेश दिया, लेकिन जब समाधान नहीं हुआ तो न्याय के लिए संघर्ष किया।

उन्होंने कहा कि क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार कर लेना नहीं है। गृहस्थ जीवन में अन्याय और अत्याचार का उचित प्रतिकार न करना क्षमा नहीं माना जा सकता। प्रतिकार की भावना प्रतिशोध से नहीं, न्याय और सुधार की भावना से होनी चाहिए।

‘दंड के पीछे क्रोध नहीं, उपकार का भाव हो’

आचार्यश्री ने गुरु-शिष्य संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि आचार्य अपने शिष्यों को अनुशासन में रखने के लिए फटकार, प्रायश्चित अथवा दंड दे सकते हैं, लेकिन उसके पीछे क्रोध या दुर्भावना नहीं, बल्कि शिष्य के कल्याण और विकास की भावना होती है।

उन्होंने कहा कि किसी को सुधारने के लिए अनुशासन आवश्यक हो सकता है, लेकिन अंतरंग भावों में क्रोध, द्वेष अथवा प्रतिशोध नहीं होना चाहिए।

‘पर्युषण के दस दिन साधु धर्म के अभ्यास का अवसर’

आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थ अणुव्रतों के माध्यम से स्थूल रूप में क्षमा का अभ्यास करता है, जबकि साधु व्यापक रूप से क्षमा धर्म का सतत पालन करते हैं। पर्युषण के दस दिन श्रावकों के लिए साधु धर्म के अभ्यास और आत्मचिंतन का विशेष अवसर हैं।

उन्होंने कहा कि यह पर्व आत्मा को परमात्मा की दिशा में आगे बढ़ाने का माध्यम है। क्रोध, मान, माया और लोभ से आत्मा की हिंसा होती है, इसलिए धर्म में अंतरंग भावों की निर्मलता का विशेष महत्व है।

‘पहले क्षमा दें, फिर क्षमा मांगें’

आचार्यश्री ने कहा कि क्षमा केवल वाणी का विषय नहीं, बल्कि भावों का विषय है। व्यक्ति को पहले सभी जीवों के प्रति अपने मन में क्षमा का भाव विकसित करना चाहिए और उसके बाद स्वयं की भूलों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए।

उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ और भगवान महावीर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अनेक भवों तक क्षमा भाव की साधना की। साधु जीवन में क्षमा का विशेष महत्व है। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।