दशलक्षण पर्व के दस दिन केवल दस धर्मों के नाम लेने के लिए नहीं हैं। प्रत्येक धर्म मनुष्य के जीवन की एक ऐसी कमजोरी की ओर संकेत करता है, जिसे पहचानकर वह अपने जीवन को बेहतर बना सकता है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, कपट के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर निर्लोभता—ये धर्म केवल शास्त्रों की बातें नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाले सूत्र हैं।

इन दस धर्मों को समझने के लिए उनसे जुड़े प्रेरक प्रसंग हमारे सामने एक जीवंत उदाहरण रखते हैं।

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1. उत्तम क्षमा धर्म

क्षमा सबसे बड़ा गुण

करीब सौ वर्ष पहले आचार्य शांतिसागर जी महाराज धौलपुर के राजखेड़ा पहुंचे थे। एक दिन आचार्यश्री ध्यान में लीन थे। उसी समय सैकड़ों हथियारबंद लोग वहां पहुंचे और श्रावकों के साथ मारपीट करने लगे। घटना की जानकारी पुलिस तक पहुंची और हमलावरों को पकड़ लिया गया।

पुलिस ने उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने का निर्णय लिया। जब यह बात आचार्यश्री को पता चली, तो उन्होंने कहा कि उनके मन में उन लोगों के प्रति कोई द्वेष नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी वजह से किसी को सजा मिलती है, तो यह उन्हें स्वीकार नहीं होगा।

आचार्यश्री ने हमलावरों की रिहाई होने तक अन्न-जल त्यागने का संकल्प ले लिया। पुलिस और प्रशासन के सामने एक ओर अपराध था और दूसरी ओर एक संत की ऐसी करुणा, जिसमें अपने साथ हुए अन्याय का भी कोई बदला लेने की भावना नहीं थी।

आचार्यश्री के क्षमा भाव का प्रभाव पड़ा और अंततः हमलावरों को छोड़ दिया गया।

धर्म का भाव

उत्तम क्षमा का अर्थ केवल किसी से ‘माफ किया’ कह देना नहीं है। मन के भीतर से क्रोध, द्वेष और बदले की भावना को कम करना ही क्षमा की वास्तविक दिशा है।

जीवन की सीख

जिसे हम क्षमा करते हैं, उससे पहले अपने मन को क्रोध के बोझ से मुक्त करते हैं।

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2. उत्तम मार्दव धर्म

अहंकार छोड़कर विनम्र बनें

सिकंदर विश्वविजय की इच्छा लेकर भारत आया। एक प्रसंग में उसका सामना एक ऐसे संत से हुआ, जो संसार की भौतिक वस्तुओं और राजसी सुविधाओं से पूरी तरह विरक्त थे।

सिकंदर ने संत को अपने साथ ग्रीस चलने का प्रस्ताव दिया। उसने धन-दौलत और राजसी सुविधाओं का लालच भी दिया। संत ने उसकी किसी बात को स्वीकार नहीं किया।

सिकंदर को अपने सामर्थ्य और शक्ति पर गर्व था। संत द्वारा उसके प्रस्ताव को ठुकराए जाने से वह क्रोधित हो गया और उसने तलवार निकाल ली। लेकिन संत के चेहरे पर न भय था और न ही क्रोध।

संत ने शांत भाव से उसे समझाया कि वह उनके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन आत्मा को नहीं। यह सुनकर सिकंदर को अपनी शक्ति की वास्तविक सीमा का अनुभव हुआ। उसकी तलवार नीचे हो गई।

कहा जाता है कि संसार जीतने निकला सिकंदर अंततः यह समझ सका कि धन, शरीर, पद और शक्ति सभी नश्वर हैं।

धर्म का भाव

मार्दव का अर्थ है कोमलता और विनम्रता। ज्ञान, धन, पद या शक्ति मिलने के बाद भी अहंकार न करना ही मार्दव धर्म की पहचान है।

जीवन की सीख

बड़ा बनने से पहले विनम्र बनना सीखना जरूरी है।

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3. उत्तम आर्जव धर्म

सरलता ही सच्ची सुंदरता है

एक बार गुणनिधि नामक मुनिराज पर्वत पर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या के प्रभाव से उन्हें आकाश मार्ग से विहार करने की शक्ति प्राप्त थी। चातुर्मास पूरा होने के बाद वे वहां से चले गए।

इसी दौरान मृदुमति मुनिराज गांव में आहार के लिए पहुंचे। गांव वालों ने उन्हें गुणनिधि मुनिराज समझ लिया। उनके प्रति लोगों ने विशेष सम्मान और आदर का भाव रखा।

मृदुमति मुनिराज समझ गए कि गांव वालों से पहचान को लेकर भूल हुई है। उन्हें यह भी पता था कि जो सम्मान उन्हें मिल रहा है, वह वास्तव में किसी दूसरे मुनिराज के कारण है। फिर भी उन्होंने लोगों को वास्तविकता नहीं बताई और उस सम्मान का लाभ लेते रहे।

यही मायाचारी उनके लिए आध्यात्मिक पतन का कारण बनी। इस भाव के परिणामस्वरूप उन्हें अगले जन्म में तिर्यंच गति प्राप्त होने और हाथी बनने का प्रसंग बताया जाता है।

धर्म का भाव

आर्जव का अर्थ है सरलता। मन में कुछ, वचन में कुछ और व्यवहार में कुछ और होना माया-कपट है। मन, वचन और काय में एकरूपता रखना आर्जव धर्म है।

जीवन की सीख

सम्मान पाने के लिए स्वयं को बदलकर प्रस्तुत करने के बजाय अपने वास्तविक स्वरूप में सरल रहना बेहतर है।

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4. उत्तम शौच धर्म

मन की शुद्धता सबसे जरूरी

चम्पापुर में लुब्धक नाम का एक सेठ रहता था। उसके पास धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसका मन लोभ से भरा हुआ था।

वह सोने को लेकर इतना आसक्त था कि उसने सोने से पशु-पक्षियों के सुंदर जोड़े तक बनवा रखे थे। एक बैल का जोड़ा अधूरा रह गया, तो उसे उसे पूरा करने की चिंता सताने लगी।

एक समय भारी वर्षा और बाढ़ के बीच भी वह अपने सोने के संग्रह और उससे जुड़ी वस्तुओं को लेकर चिंतित रहा। राजा को जब उसके बारे में जानकारी मिली, तो पहले उसे गरीब समझकर सहायता करने की इच्छा हुई, लेकिन उसके घर में सोने का अपार संग्रह देखकर राजा भी आश्चर्यचकित रह गया।

धन उसके पास बहुत था, लेकिन धन के प्रति मोह उससे भी बड़ा था। इसी आसक्ति के कारण उसका जीवन लगातार चिंता और संग्रह में उलझा रहा। उसके जीवन के अंत और अगले जन्म से जुड़ा प्रसंग लोभ के दुष्परिणाम की ओर संकेत करता है।

धर्म का भाव

शौच का अर्थ केवल शरीर और वस्तुओं की सफाई नहीं है। मन को लोभ, लालच और अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त करना भी आंतरिक शुद्धता है

जीवन की सीख

धन घर में हो तो ठीक है, लेकिन धन मन में घर बना ले, तो शांति चली जाती है।

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5. उत्तम सत्य धर्म

सच से बड़ा कोई सहारा नहीं

राजा वसु की सभा में दो विद्वानों के बीच एक शास्त्रवाक्य के अर्थ को लेकर विवाद हुआ। राजा वसु को सही अर्थ का ज्ञान था, लेकिन एक पुराने वचन के कारण उन्होंने सत्य जानते हुए भी गलत पक्ष का समर्थन कर दिया।

उन्होंने गलत अर्थ को ही सही बता दिया।

कहा जाता है कि राजा वसु का सिंहासन उनके सत्य के प्रभाव से हवा में टिका रहता था। जैसे ही उन्होंने असत्य का साथ दिया, सिंहासन धरती में धंसने लगा। सभा में उपस्थित लोगों ने उन्हें अपनी भूल स्वीकार कर सत्य का साथ देने के लिए कहा, लेकिन राजा अपने निर्णय पर अड़े रहे।

यह प्रसंग बताता है कि सत्य का प्रभाव केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के पूरे जीवन और चरित्र में होता है।

धर्म का भाव

उत्तम सत्य का अर्थ केवल झूठ न बोलना नहीं है। सत्य के साथ शुद्ध भावना, विवेक और हितकारी वाणी भी आवश्यक है।

जीवन की सीख

सत्य जानते हुए भी असत्य का साथ देना चरित्र को कमजोर करता है।

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6. उत्तम संयम धर्म

नियम पर अटल रहने की शक्ति

एक बार सागरसेन मुनिराज जंगल में सामायिक कर रहे थे। वहां एक लोमड़ी उनके पास आई। मुनिराज ने उसे हिंसा से बचने और सूर्यास्त के बाद भोजन-पानी का त्याग करने का नियम लेने की प्रेरणा दी।

लोमड़ी ने नियम स्वीकार कर लिया।

एक दिन उसे बहुत तेज प्यास लगी। वह पानी की तलाश में एक कुएं के पास पहुंची। कुएं के अंदर अंधेरा था। उसे लगा कि सूर्यास्त हो चुका है, इसलिए उसने पानी नहीं पिया और वापस लौट आई।

कुछ समय बाद उसे फिर प्यास लगी और वह दोबारा कुएं के पास पहुंची। लेकिन उसने नियम का पालन करते हुए पानी नहीं पिया। ऐसा कई बार हुआ।

जब वास्तव में सूर्यास्त हुआ, तब भी उसने अपना नियम नहीं तोड़ा। नियम के प्रति उसकी दृढ़ता का यह प्रसंग संयम की शक्ति को सामने रखता है।

धर्म का भाव

संयम का अर्थ है स्वयं को नियंत्रण में रखना। जैन दर्शन में प्राणियों की रक्षा और इंद्रियों तथा मन पर विजय को संयम का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

जीवन की सीख

बड़ा संयम अचानक नहीं आता; छोटे-छोटे नियमों का पालन ही आत्मनियंत्रण को मजबूत करता है।

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7. उत्तम तप धर्म

तप का उद्देश्य आत्मकल्याण

उज्जयिनी में भर्तृहरि और शुभचंद्र नाम के दो भाई थे। दोनों तपस्या के मार्ग पर चले। तपस्या के प्रभाव से भर्तृहरि को ऐसी सिद्धि प्राप्त हुई, जिससे वह वस्तुओं को सोने में बदल सकता था।

सिद्धि मिलने के बाद उनके भीतर अपनी शक्ति का गर्व पैदा हो गया। वे अपनी इस क्षमता को अपने भाई शुभचंद्र को दिखाने पहुंचे।

शुभचंद्र मुनिराज ने पास की मिट्टी उठाई और चट्टान पर डाल दी। देखते ही देखते पूरी चट्टान सोने में बदल गई।

भर्तृहरि को अपनी सिद्धि की सीमा समझ में आ गई। जिस शक्ति पर उन्हें गर्व था, वह भी सांसारिक वस्तुओं तक ही सीमित थी। उन्हें यह अनुभव हुआ कि तप का उद्देश्य सोना बनाना या कोई चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल बनाना है।

उन्होंने अपनी भूल को स्वीकार किया और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़े।

धर्म का भाव

तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इच्छाओं, आसक्ति और विकारों को कम करते हुए आत्मशुद्धि की दिशा में बढ़ना है।

जीवन की सीख

जिस तप से अहंकार बढ़े, वह साधना अधूरी है; सच्चा तप भीतर की अशुद्धियों को कम करता है।

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8. उत्तम त्याग धर्म

त्याग से समाज का भला

सन् 1547 में मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ में दानवीर भामाशाह का जन्म हुआ। वे महाराणा प्रताप के सहयोगी और सलाहकार थे।

मुगलों के साथ संघर्ष के दौरान मेवाड़ की आर्थिक स्थिति कठिन हो गई। महाराणा प्रताप को अपने परिवार के साथ कठिन परिस्थितियों में जंगलों में रहना पड़ा। सेना के सामने भी संसाधनों की कमी थी।

ऐसे समय में भामाशाह ने अपनी संपत्ति महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी। कहा जाता है कि उनके द्वारा दिए गए धन से बड़ी संख्या में सैनिकों का लंबे समय तक निर्वाह किया जा सकता था।

भामाशाह चाहते तो अपनी संपत्ति को अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षित रख सकते थे, लेकिन उन्होंने उसे व्यापक उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया।

उनका यह त्याग आज भी समर्पण और सहयोग का उदाहरण माना जाता है।

धर्म का भाव

त्याग केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं है। अपनी क्षमता, धन, समय, ज्ञान और संसाधनों का उपयोग दूसरों के हित में करना भी त्याग की भावना है।

जीवन की सीख

सच्चा त्याग वही है, जिससे किसी दूसरे का जीवन बेहतर हो।

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9. उत्तम आकिंचन्य धर्म

वास्तव में हमारा क्या है?

एक व्यक्ति एक तपस्वी महाराज के पास आशीर्वाद लेने पहुंचा। महाराज ने उसे कहा—“जाओ, तुम मनुष्य बनो।”

वह व्यक्ति आश्चर्यचकित हुआ। उसने कहा कि वह तो पहले से ही मनुष्य है।

तपस्वी महाराज ने समझाया कि मनुष्य का जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है। यदि पूरा जीवन केवल वस्तुओं को इकट्ठा करने, उन्हें अपना मानने और उनके लिए चिंता करने में निकल जाए, तो मनुष्य अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है।

उन्होंने उसे समझाया कि संग्रह की प्रवृत्ति केवल चींटी में नहीं, मनुष्य में भी हो सकती है। अंतर केवल इतना है कि मनुष्य के पास संग्रह करने की क्षमता बहुत अधिक है।

उस व्यक्ति को अपनी भूल का अनुभव हुआ। उसने समझा कि धन, संपत्ति, शरीर और वस्तुएं स्थायी रूप से उसकी नहीं हैं। जीवन के अंत में बाहरी संग्रह पीछे रह जाता है।

धर्म का भाव

आकिंचन्य हमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ के मोह को कम करने की प्रेरणा देता है। आत्मा को शरीर और परद्रव्यों से अलग समझना इसका महत्वपूर्ण भाव है।

जीवन की सीख

संग्रह कम करना ही पर्याप्त नहीं; ‘यह मेरा है’ का भाव कम करना भी जरूरी है।

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10. उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

आत्मा में रमण ही ब्रह्मचर्य

अयोध्या के राजा राम से जुड़ा प्रसंग आत्मसंयम और आत्मसाधना की प्रेरणा देता है। राजपाट का जीवन छोड़कर उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और मुनि जीवन अपनाया। सीता ने भी दीक्षा लेकर तप और साधना का मार्ग चुना।

एक प्रसंग में सीता के जीव ने मुनि राम को गहन ध्यान में लीन देखा। उन्होंने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया, लेकिन मुनि राम अपनी आत्मसाधना में इतने स्थिर थे कि बाहरी आकर्षण उन्हें विचलित नहीं कर सके।

उनका मन विषयों की ओर जाने के बजाय आत्मचिंतन में लगा रहा। यही स्थिरता ब्रह्मचर्य के व्यापक भाव को समझाती है।

धर्म का भाव

ब्रह्मचर्य केवल बाहरी विषय-संयम तक सीमित नहीं है। अपनी दृष्टि, विचार, ऊर्जा और चेतना को आत्मकल्याण की दिशा में लगाना भी इसका व्यापक अर्थ है।

जीवन की सीख

जब मन बाहरी आकर्षणों से हटकर आत्मा में स्थिर होने लगता है, तभी ब्रह्मचर्य का वास्तविक भाव समझ में आता है।