धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर आराधना के 34वें दिन छह पुण्यार्जक परिवारों ने सपरिवार विधान में बैठकर भक्तिमय एवं संगीतमय वातावरण में भक्तामर महामंडल विधान के मंडप पर 48 अर्घ्य श्रद्धापूर्वक समर्पित किए।प्रवचन श्रृंखला में आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ने सोलह कारण भावना में शक्तितस्य त्याग धर्म की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद यदि व्यक्ति उसका सदुपयोग नहीं करता तो वही ज्ञान विनाश का कारण बन सकता है। जीवन में त्याग का विशेष महत्व है और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार त्याग करना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि त्याग की भावना से देश, धर्म और समाज का उत्थान होता है। स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों ने तन, मन और धन का त्याग किया, तभी देश को आजादी प्राप्त हुई। इसी प्रकार दिगंबर साधु भी देश, समाज और राष्ट्र पर संकट आने की स्थिति में अपने पद का त्याग कर राष्ट्रहित में अपना योगदान दे सकते हैं।
त्याग धर्म को अपना अस्त्र बनाएं
उन्होंने कहा कि हमें भी त्याग धर्म के महत्व को समझते हुए अपनी शक्ति के अनुसार व्रत, संयम और त्याग को जीवन में अपनाना चाहिए। जब प्रत्येक व्यक्ति त्याग और संयम की भावना से समाज, धर्म एवं राष्ट्र के निर्माण में अपनी सहभागिता निभाएगा, तभी एक श्रेष्ठ और संस्कारित समाज का निर्माण संभव होगा।




