कुण्डलपुर(म.प्र.)। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं, मुक्ति की मंजिल हो अथवा जीवन का कोई सांसारिक लक्ष्य, सफलता के लिए इन तीनों को समझना और जीवन में उतारना आवश्यक है। यह उदगार मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर तीर्थराज पर जीवन में सही चुनाव और निर्णय की कला पर प्रभावशाली मार्गदर्शन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सही को पहचानने की दृष्टि,सही एवं पूर्ण ज्ञान तथा लिए गए निर्णय पर दृढ़ता से टिके रहने का चारित्रबल ही व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुंचाता है। मुनिश्री ने कहा कि मिथ्या दर्शन और सम्यक दर्शन में अंतर पहचानना जीवन की पहली आवश्यकता है, आधुनिक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मिथ्या दर्शन कृत्रिम रील है और सम्यक दर्शन वास्तविक रील है। दोनों को देखकर अंतर समझना पर्याप्त नहीं, बल्कि सही को पहचानकर उसे स्वीकार करने की दृष्टि विकसित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जानकारी होना ही ज्ञान नहीं है। प्रश्न यह है कि हमारे पास सही और परिपूर्ण जानकारी है या नहीं? ज्ञान के बाद निर्णय और निर्णय के बाद उस पर टिके रहने का सामर्थ्य चारित्र प्रदान करता है।
विकल्प बहुत मिलेंगे मार्ग भटकाने के लिए
उन्होंने सही चुनाव के चार सहायक सूत्र बताते हुए पहला सूत्र ‘तथ्य या भय’ बताया। सही निर्णय लेते समय यह देखना चाहिए कि हमारा निर्णय वास्तविक तथ्यों पर आधारित है अथवा भय के कारण लिया जा रहा है। दूसरा सूत्र ‘360 डिग्री दृष्टि’ है। किसी विषय के केवल एक पहलू को देखकर निर्णय लेने के बजाय उसके सभी पक्षों को समझना चाहिए। सत्य के अनेक पहलू होते हैं और जैन दर्शन का अनेकांतवाद तथा स्याद्वाद इसी व्यापक दृष्टि की प्रेरणा देता है। तीसरा सूत्र ‘विवेक’ बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि विवेक जीवन का गेम चेंजर है। उपलब्ध विकल्पों में सही-गलत,उपयोगी-अनुपयोगी तथा अल्पकालिक और दीर्घकालिक हित के बीच अंतर करने की क्षमता विवेक देता है। उन्होंने कहा, “विकल्प बहुत मिलेंगे मार्ग भटकाने के लिए, लेकिन विवेक सिर्फ एक ही काफी है संकल्प को निभाने के लिए।” चौथा सूत्र ‘मूल्य सृजन’ है। व्यक्ति का चुनाव ऐसा होना चाहिए जिससे स्वयं के साथ दूसरों का भी हित हो। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी जुड़ी हुई है और किसी को मानसिक, व्यवहारिक अथवा शारीरिक कष्ट न पहुंचाना जिम्मेदार चुनाव की पहचान है।
आज युवा तीन बड़े चक्रव्यूहों में फंसा है
मुनिश्री ने सही चुनाव में बाधक तीन तत्त्वों की ओर भी ध्यान दिलाया। पहली बाधा है गलत धारणा, जिसमें व्यक्ति बिना पूरी जानकारी के किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में अपनी धारणा बना लेता है और फिर उसी आधार पर व्यवहार करने लगता है। दूसरी बाधा अत्यधिक लालच और भय है। लालच व्यक्ति की तार्किक क्षमता को प्रभावित करता है और बिना सोच-विचार निर्णय लेने को मजबूर कर सकता है। इसी प्रकार भय भी निर्णय क्षमता को कमजोर करता है। तीसरी और सबसे बड़ी बाधा प्रमाद है। टालमटोल, लापरवाही और समय पर निर्णय न लेना व्यक्ति को बड़े अवसरों से वंचित कर देता है। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए दिन, घंटे ही नहीं, मिनट और सेकंड का भी महत्व है। युवाओं की करियर संबंधी दुविधाओं पर मुनिश्री ने कहा कि आज युवा तीन बड़े चक्रव्यूहों में फंसा है। पहला- सुरक्षित नौकरी चुने या स्वयं का व्यवसाय करे। दूसरा- अधिक वेतन वाला रोजगार चुने या मानसिक शांति देने वाला काम। तीसरा- माता-पिता की इच्छा पूरी करे या अपने सपने को चुने। उन्होंने कहा कि विकल्प अनेक हो सकते हैं, लेकिन दुविधा में पड़े रहना उचित नहीं। कुछ भी चुनो, लेकिन चुन तो लो। निर्णय लेने के बाद पूरी जिम्मेदारी के साथ उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
संबंधों में विवेक की आवश्यकता बताई
मुनिश्री ने संबंधों में विवेक की आवश्यकता बताते हुए एक मार्मिक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि एक पिता ने बेटे को पढ़ाकर विदेश भेजा। उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेटा वापस आया। एक दिन पिता-पुत्र के बीच सामाजिक और राजनीतिक विषय पर चर्चा बहस में बदल गई। आधुनिक ज्ञान के अहंकार में बेटे ने पिता को कह दिया कि आपकी सोच पिछड़ी हुई है और आप आज की दुनिया को नहीं समझते। पिता का हृदय टूट गया और उन्होंने बेटे से बात करना बंद कर दिया। तीन वर्ष बाद पिता की अचानक मृत्यु हो गई। अंतिम संस्कार के समय बेटे को एहसास हुआ कि एक बहस जीतने के प्रयास में उसने जीवन के सबसे अनमोल व्यक्ति को हमेशा के लिए खो दिया।
मुनिश्री ने कहा कि बहस जीतकर संबंध हार जाना जीवन की सबसे बड़ी हार है। अपनों से बहस करते समय स्वयं से पूछें कि मुझे बहस जीतनी है या संबंध। उन्होंने प्रेरक पंक्तियां सुनाईं- जिंदगी में यह हुनर भी आजमाना चाहिए, जंग जब अपनों से हो तो हार जाना चाहिए।” अहंकार को विसर्जित करने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि झुकना कमजोरी नहीं है। महासागर नीचे रहता है, इसलिए सभी नदियां उसी में आकर मिलती हैं। उन्होंने कहा कि शरीर के घाव भर जाते हैं, लेकिन शब्दों के बाण जीवन भर चुभ सकते हैं। इसलिए विवेक से अपने शब्दों को तौलकर ही बाहर निकालें। निर्णय की स्वतंत्रता व्यक्ति के पास है, लेकिन उसकी कीमत जिम्मेदारी है। जिस दिन मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसके जीवन का प्रत्येक कदम उसका अपना चुनाव है, उसी दिन से जीवन में परिवर्तन की शुरुआत हो जाती है।
करियर में जीवन की अनेक समस्याओं के समाधान के सूत्र है
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को अगले 24 घंटे का आत्मपरीक्षण प्रयोग देते हुए कहा कि वे देखें कि चुनाव के चार सहायक और तीन बाधक तत्त्वों में से वे किनका और कितना पालन करते हैं। विशेष रूप से निर्णय लेने से पहले 10 सेकंड का ठहराव लेकर यह देखें कि निर्णय विवेक से लिया जा रहा है या आवेग में। प्रवचन के समापन पर उन्होंने जीवन का सूत्र देते हुए कहा कि Life is a Choice—Choose it Wisely अर्थात जीवन चुनाव है और हर चुनाव विवेक, समझदारी तथा जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन धर्मग्रंथों को केवल धार्मिक दृष्टि से न देखें।
ग्रंथों को पढ़ा जाए, समझा जाए
आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र में आज के पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक और करियर में जीवन की अनेक समस्याओं के समाधान के सूत्र मौजूद हैं। आवश्यकता है कि इन ग्रंथों को पढ़ा जाए, समझा जाए और उनके व्यावहारिक संदेश को जीवन में उतारा जाए। यह जानकारी राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं चातुर्मास प्रचार प्रसार प्रभारी जयकुमार जैन ‘जलज’ ने दी।




