मुरैना। आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए स्थितिकरण अंग की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन अथवा सम्यक्चारित्र से विचलित हो रहे व्यक्ति को प्रेम, वात्सल्य और विवेकपूर्वक पुनः धर्ममार्ग में स्थापित करना ही स्थितिकरण अंग कहलाता है। आचार्यश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति को धर्म से गिरते हुए देखकर उसकी आलोचना करना बहुत आसान है, लेकिन उसके भीतर धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास को पुनः जागृत करना कठिन है। सच्चा धर्म वही है, जिसमें हम किसी की कमियां गिनाने के बजाय उसे संभालने और सही मार्ग पर लाने का प्रयास करें। उन्होंने उपगूहन अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पैर में फोड़ा हो जाए तो पहले उसकी गंदगी और मवाद को दूर किया जाता है। उसी प्रकार साधर्मी के दोषों को समाज में उजागर करने के बजाय उन्हें ढंककर, दूर कर और सुधारने का प्रयास करना उपगूहन अंग है। इसके बाद जब कोई व्यक्ति धर्ममार्ग से चलायमान होने लगे तो उसे पुनः धर्म में दृढ़ करना स्थितिकरण अंग है। आचार्यश्री ने कहा कि धर्मवत्सलता और प्राज्ञता से युक्त व्यक्ति ही किसी को सही अर्थों में धर्म में स्थित कर सकता है। केवल ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने आचरण और वात्सल्य से सामने वाले के भीतर आत्मबल पैदा करना भी आवश्यक है।
शांतिसागर जी महाराज का प्रेरक प्रसंग
आचार्यश्री ने चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर ji महाराज के जीवन का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उनके समय में एक दिगम्बर मुनिराज का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया था। वे आजीवन यम-सल्लेखना धारण किए हुए थे। अस्वस्थता के कारण उन्होंने पानी की इच्छा व्यक्त की। आचार्य शांतिसागरजी महाराज ने जब उस मुनिराज को देखा तो अपने से छोटे होने के बावजूद अत्यंत विनय और वात्सल्य के साथ उन्हें ‘नमोस्तु’ किया। इतने बड़े साधु द्वारा स्वयं को इस प्रकार सम्मान दिए जाने से मुनिराज आश्चर्यचकित रह गए। शांति सागर जी महाराज के उस सहज वात्सल्य का उनके मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनके भीतर पुनः आत्मबल और धर्मभाव जागृत हो गया। उन्होंने फिर पानी की मांग नहीं की और अपनी सल्लेखना में दृढ़ रहे। आचार्यश्री ने कहा कि यही स्थितिकरण अंग का जीवंत उदाहरण है। शान्तिसागर महाराज ने केवल शब्दों से उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपने व्यवहार और वात्सल्य के माध्यम से धर्म से चलायमान हो रहे मुनिराज को पुनः धर्म में दृढ़ कर दिया।
आलोचना नहीं, वात्सल्य से संभालें : मुनिश्री उपशांत सागरजी
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागरजी ने कहा कि आज समाज में हम दूसरों की गलतियां देखने और बताने में जितनी जल्दी करते हैं, उतनी तत्परता किसी को संभालने में नहीं दिखाते। उन्होंने कहा कि धर्म का काम किसी को गिरा हुआ बताना नहीं, बल्कि गिरते हुए को हाथ देकर उठाना है। मुनिश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पूजा-पाठ, संयम, साधना या धार्मिक गतिविधियों से दूर हो रहा है तो उसके प्रति उपेक्षा का भाव नहीं रखना चाहिए। उसके पास जाकर प्रेम से बात करनी चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि वह धर्म से दूर क्यों हो रहा है। कई बार व्यक्ति को उपदेश से अधिक अपनेपन और वात्सल्य की आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि एक कठोर शब्द व्यक्ति को धर्म से और दूर कर सकता है, जबकि प्रेम से बोले गए दो शब्द उसे धर्म के निकट ला सकते हैं। इसलिए साधर्मी के प्रति करुणा, वात्सल्य और सहयोग की भावना रखना प्रत्येक श्रावक का दायित्व है।मुनिश्री ने कहा कि स्थितिकरण का अर्थ केवल किसी को रोक देना नहीं, बल्कि उसके भीतर धर्म के प्रति श्रद्धा, आत्मविश्वास और आत्मबल को पुनः जागृत करना है। जो व्यक्ति स्वयं धर्म में स्थित होकर दूसरों को भी धर्म में स्थिर करने का प्रयास करता है, वही इस अंग की वास्तविक भावना को समझता है। उन्होंने कहा कि समाज तभी मजबूत होगा, जब हम एक-दूसरे की कमियां खोजने के बजाय एक-दूसरे को संभालने का संकल्प लेंगे। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रेरक प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना।





