आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में पट्टाचार्य आचार्य विशुद्ध सागर जी के तीन शिष्य श्रमण मुनि समत्व सागर महाराज, श्रमण मुनि शील सागर महाराज और श्रमण मुनि सुप्रभात सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में धर्मसभा का शुभारंभ हुआ। पदाधिकारियों द्वारा आचार्य विराग सागर जी महाराज के चित्र का अनावरण और मुनि श्री का पाद प्रक्षालन किया गया। 10 नवंबरसे 16 नवंबर तक होने वाले 1008 समवशरण महामंडल विधान के लिए मुनि 108 समत्व सागर महाराज ससंघ एवं पं. विजय जैन शास्त्री के सान्निध्य में रमेश चंद्र, दिनेश चंद्र, जगदीश चंद्र जैन (टायर वाले) ने ध्वजारोहण और पूजन विधि संपन्न कराई।

मुनि समत्व सागर जी का प्रवचन : पंचसंग्रह में ज्ञान का स्वरूप

मुनि समत्व सागर जी ने अपनी अमृतमयी वाणी में कहा कि पंचसंग्रह नामक महानतम ग्रंथ में हमने जीव के दो उपयोगों को समझा। जो विकल्पात्मक है, वह ज्ञान है और जो निर्विकल्प है, वह दर्शन है। उन्होंने कहा कि जब भी हम ज्ञान को ग्रहण करते हैं, तो मात्र ज्ञान कहकर छोड़ दिया करते हैं। सबको इतना ज्ञान है कि ज्ञान होता है। इसका बोध बहुत से जीवों को है कि चेतना ज्ञानात्मक है, किंतु इतने बोध से कार्य नहीं बनता। ज्ञान कब समीचीन होता है और कब विपरीत हो जाता है, यह समझना आवश्यक है। साथ ही ज्ञान में भी अंतर है। ज्ञान की विशेष-विशेष पर्यायों पर जगत में किसी ने चर्चा नहीं की। लोगों ने मात्र ज्ञान बोल दिया, लेकिन ज्ञान के अंदर क्या-क्या घटित होता है, कैसे-कैसे यह क्रमपूर्वक होता है और किस प्रकार इसका वर्गीकरण किया जा सकता है, इस पर विचार करना होगा। ज्ञान को स्वीकार करें तो उसके भेद-प्रभेद को भी स्वीकार करना होगा।

प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान की व्याख्या

आचार्य भगवंत उसी भेद-प्रभेद की 41 नंबर की गाथा में विशद व्याख्या करने जा रहे हैं। अभी तक हमने कहा कि सबका ज्ञान होता है, लेकिन सब जिस ज्ञान से जानते हैं, वह ज्ञान भी अलग-अलग होता है। कौन से ज्ञान से बात कर रहे हो, कौन सा ज्ञान आपके पास है, आपका ज्ञान का स्तर क्या है, क्या आपका ज्ञान वस्तुओं को सीधा-सीधा जान सकता है या वस्तुओं को जानने के लिए उसे किसी बात का अवलंबन लेना पड़ता है, यह विचार करना है। ज्ञान आत्मा का गुण है, ज्ञानोपयोग आत्मा का गुण है। आत्मा जानती है, यह बात तो हम जानते हैं, लेकिन क्या आत्मा बिना किसी अवलंबन के जानती है या अवलंबन से जानती है? दो प्रकार से ज्ञान को फिर से विभाजित किया जाएगा। यदि हम सीधे-सीधे बिना किसी अवलंबन के जानें, तो वह प्रत्यक्ष है। जिसमें हम किसी बात का अवलंबन लेकर जानें, वह परोक्ष है। जैसे आप सीधे-सीधे वस्तु को देख पा रहे हैं, आंखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं, लेकिन वहीं पर्दा था या आंखों के सामने चश्मा था। चश्मा लगाकर देखा तो परोक्ष रूप में देखा, सीधा-सीधा नहीं देखा। ऐसे ही यदि इंद्रियों का प्रयोग आत्मा ने किया, तो वह परोक्ष हो गया और इंद्रिय के बिना आत्मा ने सीधा-सीधा जान लिया, तो प्रत्यक्ष हो गया। प्रति $ अक्ष से प्रत्यक्ष शब्द बना। अक्ष के दो अर्थ हैं - आत्मा और इंद्रियां। जब अक्ष का अर्थ आत्मा लेते हैं, तो जो आत्मा के प्रति सीधे होता है, उसका नाम प्रत्यक्ष है। यदि अक्ष का अर्थ इंद्रियां लेते हैं, तो जो इंद्रियों के माध्यम से होता है, वह प्रत्यक्ष है।

जैन दर्शन और लौकिक मान्यता में अंतर

मुनि श्री ने कहा कि जो जैन दर्शन का प्रत्यक्ष है और अन्य लौकिक प्रत्यक्ष है, उसमें बहुत बड़ा अंतर है। लौकिक मान्यताओं में अक्ष का अर्थ इंद्रिय किया गया है और जिन शासन में अक्ष का अर्थ आत्मा किया गया है।

मंच संचालन और उपस्थिति

मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया। इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन (बल्लो), विवेक जैन, मुकेश जैन, प्रवीन जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, हरेश जैन, हजारी लाल जैन, रविंद्र जैन, रोहित जैन, आशीष जैन (बाबा), मीडिया प्रभारी राहुल जैन, समस्त मंडल एवं सकल जैन समाज उपस्थित रहा।