विशिष्ट रामकथाकार मुनि श्री जयकीर्ति जी रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में रामकथा का वाचन कर रहे हैं। राम कथा का रविवार को 10 वां दिन था। अकलंक स्कूल परिसर में रामपुरा में श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्म पुराण आधारित प्रवाहमान जैन-रामकथा का समापन हुआ। कोटा से पढ़िए, यह खबर..
कोटा। विशिष्ट रामकथाकार मुनि श्री जयकीर्ति जी रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में रामकथा का वाचन कर रहे हैं। राम कथा का रविवार को 10 वां दिन था। अकलंक स्कूल परिसर में रामपुरा में श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्म पुराण आधारित प्रवाहमान जैन-रामकथा का समापन हुआ। इस अवसर पर रामकथा समापन एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। अकलंक एसोसिएशन के अध्यक्ष पीयूष जैन बज, सचिव अनिमेष जैन ने कि बताया मां जिनवाणी को पालकी में रखने का सौभाग्य महेंद्र कुमार जैन, मुन्नी जैन अतुल, शानू, लक्षिता पाटनी परिवार को मिला।
राजा श्रेणिक बनने का अवसर ऋषभ जैन सुनीता जैन चांदवाड़ परिवारजन को मिला। महेश जैन गंगवाल ने बताया कि मुनि श्री का पाद प्रक्षालन अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद शाखा कोटा के पदाधिकारियों ने किया। समापन के अवसर पर रामकथा को सफल बनाने में अपना अविस्मरणीय योगदान देने वाले श्रावक श्रेष्ठी का अभिनंदन किया गया। पीयूष बज, अकलंक स्कूल के समस्त स्टॉप, नवीन लुहाड़िया, महावीर ललित लुहाड़िया, महाराष्ट्र से आए विद्या सागर जैन संगीतकार, पारस जैन पार्श्वमणि, दस दिनों के पुण्यार्जक परिवार फोटो ग्राफर सन्मति जैन, सन्मति पाटनी का मुनि श्री ने करकमलों से सिर पर तिलक लगाकर स्वागत किया। राम सूत्र दिया।
मनुष्य राम आदि के उत्तम प्रेरणादायी चरित्र को सुनते हैंअल्पाहार की व्यवस्था महावीर, ललित, नवीन लुहाड़िया परिवार तलवंडी की ओर से की गई। मंगलाचरण पाठ राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन "पार्श्वमणि" पत्रकार ने धर्म हो सच्चा साथी है जैसे दीपक बांती है सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया। अकलंक स्कूल की दो बालिकाओं ने भक्ति पूर्ण नृत्य किया। मुनि श्री जयकीति जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कथानक को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जो मनुष्य राम आदि के उत्तम प्रेरणादायी चरित्र को सुनते हैं। उनके प्रति मन में अतिशय भक्ति एवं प्रमोद को धारण करते हैं। उनका चिरसंचित पापकर्म हजार टुकड़े होकर नष्ट हो जाता है। हे विवेकी चतुर पुरुषों ! अपने अशुभ कर्मों को नष्ट करने के लिए एवं समीचीन मार्ग की प्राति के लिए इस परम पवित्र चरित्र का पठन-पाठन करो।
यदि इस भव से निर्वाण को पाओ तो अच्छा हैराम आदि द्वारा महेन्होदय उद्यान में जाकर सर्वभूषण केवली भगवान के मुखारबिंद से धर्मोपदेश सुनते हैं एवं विभीषण की जिज्ञासा शांत करते हुए भगवान् राम आदि के पूर्वभवों का वर्णन करते हैं। अपने पूर्वभव सुनकर कृतान्त वक्र सेनापति विरक्त हो जिनदीक्षा हेतु तत्पर होते हैं। राम उनसे कहते हैं कि तुम यदि इस भव से निर्वाण को पाओ तो अच्छा है यदि देव बनो तो संकट के समय मुझे प्रबोधन करने अवश्य आना तदनन्तर लक्ष्मण सीता आर्यिका माता को नमस्कार कर अनेक प्रकार से उनकी स्तुति एवं प्रशंसा करते हैं। इधर, भामंडल राज्य - विषय भोगों में प्रवृत्ति को ही मनुष्य जन्म की सार्थकता समझकर उसमें ही आसक्त रहते थे। एक दिन वज्रपात के आघात से मरण को प्राप्त होते हैं। संसारी जीव मैं ये कर चुका हूँ। ये कर रहा हूं और ये करूँगा ऐसा सदा सोचता रहता है परन्तु मैं मरूंगा इस बात पर विचार नहीं करता है।
धर्मरत्न मुनिराज के भक्तियुक्त हो दर्शन करते हैपुण्यशाली हनुमान कर्णकुण्डल नगर के जिनमदिर में विराजमान धर्मरत्न मुनिराज के भक्तियुक्त हो दर्शन करते है और विचार करते हैं कि इस संसार में मैंने करने योग्य समस्त कार्य कर लिए है अब मैं जिनपथ पर चलकर निज आत्मा का कल्याण करूंगा। जो जिनदर्शन-पूजा-में लीन है। ऐसे निर्मल चित्त के धारी मनुष्यों के लिए कोई भी कल्याण दुर्लभ नहीं है। उन्होंने 750 राजाओं सह जिनदिक्षा धारण की एवं मुक्ति पाई। सौधर्म इन्द्र के मुख से राम-लक्ष्मण के अटूट स्नेह की वार्ता सुन क्रीडा के रसिक दो देव कौतुहलवश लक्षमण को राम की मृत्यु की सूचना देता है। सुनते ही राम- अनुरागी लक्ष्मण मरण को प्राप्त होते हैं। यह देख दोनों देव विषाद युक्त हो पश्चाताप करते है। इज घटना से विरक्त लवकुश दीक्षा ले लेते हें..स्नेहासिक्त व्याकुल राम लक्ष्मण को सचेत करेने हेतु अनेक प्रयत्न करते हैं, मृत भाई को खिलाना - स्नान कराना- सजाना संगीत सुनाना आदि बालकवत चेष्टाएं करते हें.. जटायु एवं कृतान्तवक्र जो कि देव पर्याय में थे वे अविधज्ञान से राम कि चेष्टाए जान उनके पास आकर उन्हें प्रबोधित करते हैं जिससे राम शोक छोड सभी के साथ सरयु नदी के किनारे लक्ष्मण का दाह संस्कार करते हैं। मोह विरक्त राम का चित्त अनेक वैराग्यपूर्ण विचारों से युक्त हुआ। गुरुभक्ति युक्त राम सुव्रत मुनिराज से सुग्रीव आदि अनेक राजाओं के साथ जिनलिंग को धारण करते हैं एवं गुरु से अनुमति ले एकाकी विहार करते हैं।
सीतेन्द्र ने केवली भगवान् से क्षमा मांगीनिराबाध सुख की कामना से मुनि राम ने जो घोर तप किया उस तप का इस कलिकाल के मनुष्य ध्यान भी नहीं कर सकते हैं.सीता के जीव सीतेन्द्र द्वारा मोहवश योगिराज राम का ध्यान भंग करने के समस्त प्रयत्न विफल रहे एवं मुनिराज राम को केवलज्ञान की विभूति प्राप्त हुई। सीतेन्द्र ने केवली भगवान् से क्षमा मांगी आदि सुख -दुःख मय प्रेरक प्रसंगों का स्वरचित सुमधुर गीतों द्वारा वर्णन करते हुए गुरुदेव ने श्री राम आदि के चरित्र को सुनने एवं पढने का अद्भुत- अनुपम फल बताया।




