पुणे/इंदौर। श्रमण संस्कृति के दिगंबर जैन संतों की पवित्र मयूर पंखी पिच्छी पर तथ्यहीन टिप्पणी करने के मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पुणे के न्यायालय ने मामले में संज्ञान लेते हुए मेनका गांधी को समन जारी कर 30 दिनों के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व मेनका गांधी ने एक बयान में आरोप लगाया था कि देश में जैन मुनियों की पिच्छियों के निर्माण के लिए लगभग 15 लाख मोरों की हत्या की गई है। इस बयान से भारत वर्षीय सकल जैन समाज में भारी आक्रोश फैल गया था। जैन समाज का स्पष्ट मत है कि पिच्छी के लिए किसी भी मोर की हत्या नहीं की जाती। मुनिराज अहिंसा के पालन हेतु मोरों द्वारा स्वाभाविक रूप से झाड़े गए (गिराए गए) पंखों को ही एकत्रित कर पिच्छी का निर्माण करते हैं। पिच्छी का उद्देश्य जीव-हिंसा नहीं, बल्कि चलते-उठते-बैठते सूक्ष्म जीवों को बचाना है।

इंदौर से भी गया था लीगल नोटिस

राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस मामले में सबसे पहले राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ, इंदौर के मयंक जैन की ओर से मेनका गांधी को कानूनी नोटिस भेजा गया था और सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की गई थी। बयान वापस न लेने पर कोर्ट की शरण नोटिस के बावजूद मेनका गांधी द्वारा बयान वापस न लेने और माफी न मांगने पर मामला अदालत पहुंचा। पुणे में शिकायतकर्ता अन्ना पाटिल व स्नेहा पांडे ने एडवोकेट जितुरकर के माध्यम से याचिका दायर की। जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह समन जारी किया है।

सिर्फ 1 रुपये की सांकेतिक क्षतिपूर्ति की मांग

खास बात यह है कि याचिकाकर्ताओं ने इस मानहानि के बदले मेनका गांधी से केवल 1 रुपये की सांकेतिक क्षतिपूर्ति की मांग की है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि यह लड़ाई किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि जैन संतों की गरिमा, अहिंसा धर्म और धार्मिक आस्था की रक्षा के लिए है। भारत वर्षीय राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने देशभर की जैन संस्थाओं से अपील की है कि धर्म, संस्कृति तीर्थों, संतों और धर्म की रक्षा के लिए संवैधानिक और कानूनी रूप से एकजुट होकर आवाज बुलंद करें। जय हो श्रमण संस्कृति।