बांसबाड़ा। जन संख्या में 4% कम परन्तु देश के राजस्व का 25 प्रतिशत देने वाले, हीरा व्यवसाय पर वर्चस्व रखने वाले, दान देने में अग्रणी, सबसे अधिक गोशाला संचालित करने वाले इन सब से उपर शाकाहारी संयमित जीवन जीने वाले होते हैं जैनत्व के धारी जैन। यह उद्गार श्री अडिन्दा पार्श्वनाथ दि. जैन अतिशय क्षेत्र पर विराजमान गणिनी श्री सुभूषण मति माताजी ने ओजस्वी वाणी में श्रावकों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा- संसार में प्रति क्षण जन्म-मरण है। जन्म और मरण को कोई रोक नहीं सकता है। यह अविरल क्रैश चलता रहता है। इसके लिए परिवार में जैनत्व का वातावरण होना चाहिए।बच्चों को सुविधाओं के साथ संस्कार भी देना चाहिए। जो संस्कारित होता है, वही संस्कार दे सकता है।
बच्चों को गर्व होना चाहिए कि हम जैन हैं। हमारी जनसंख्या कम हो रही है, इसमें साधुओं की संख्या बढ़ रही है लेकिन, श्रावकों की जनसंख्या कम हो रही है। इस असंतुलन को रोकना आवश्यक है। नदी के बहाव के प्रतिकूल दिशा में तैरना कठिन होता है। अधिक शक्ति, अधिक श्रम, अधिक समय लगता है। आज के परिवेश में साधु उसी प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साधु अपने वैराग्य को मजबूत बनाए हैं। गुरु मां ने कहा- आपने मकान तो बना दिया पर एक जैन श्रावक जरूर बनाएं। साधु और श्रावक दोनों को जैन धर्म बचाए रखना है ।आप स्वयं संस्कारवान बने अपनी चर्या से अगली पीढ़ी में जैनत्व के संस्कार रोपित करें।उन्होंने कहा जैन आपस में बंटे हैं।बटोगे तो कटोगे।
अपनी शक्ति का अहसास करें। माताजी ने आज के प्रवचन में जीवन जीने की शैली बता कर सबका मन मोह लिया।भक्त जयकार करते गुरु चरण मैं वन्दामी वन्दामी वन्दामी निवेदन करते निज धाम को प्रशस्त हुए। यह जानकारी अंजलि जैन खतौली मुजफ्फरनगर ने दी।



