दिल्ली, ऋषभोदय। उच्च दृष्टि से जीवन को बनाएं श्रेष्ठ दिल्ली के ऋषभोदय दिगंबर जैन मंदिर में विराजित श्रमण-संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में उच्च विचार, पवित्र आचरण, आत्मचिंतन और पुण्य पुरुषार्थ अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके आचरण, विचार और कर्मों से होती है।
चील नहीं, चकोर जैसी दृष्टि बनाएं
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में उच्चता, श्रेष्ठता और आदर्श प्राप्त करना है तो चील नहीं, चकोर जैसी दृष्टि बनानी चाहिए। चील आकाश में ऊंची उड़ान भरते हुए भी भूमि पर पड़े मांस के टुकड़े को देखती है, जबकि चकोर भूमि पर रहते हुए आकाश में चमकते चंद्रमा को निहारता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की दृष्टि भी ऊंचे और श्रेष्ठ लक्ष्यों पर होनी चाहिए। उच्च पद पर विराजित व्यक्ति यदि निम्न सोच और निम्न कार्य करता है तो वह चील के समान है। सज्जन पुरुषों को सादा जीवन और उच्च विचार अपनाने चाहिए।
अग्नि लगाने वालों में नहीं, बुझाने वालों में नाम हो
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपनी बुद्धि, विवेक, शक्ति और ज्ञान का उपयोग अच्छे कार्यों में करना चाहिए। अपने समय, सोच और धन को समाज एवं जीवन की उन्नति में लगाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति का नाम अग्नि लगाने वालों में नहीं, बल्कि अग्नि बुझाने वालों में होना चाहिए। आतंकवाद की सोच के स्थान पर अनेकांत दृष्टि से जीवन जीना चाहिए। व्यक्ति को सहयोगी बनना चाहिए, विरोधी नहीं।
उन्होंने जीवन में विकास की राह पर चलने, विनाश से दूर रहने, उत्थान करने और पतन से बचने तथा सृजन की सोच विकसित करने का संदेश दिया।
देह देवालय, आत्मा भगवान
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि मानव आत्म-ध्यान और आत्मशोधन के माध्यम से आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। देह देवालय है और उसमें विराजमान आत्मा देव है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने शरीर में विराजित आत्म-देव पर दृष्टिपात करना चाहिए। आत्मा ही संयम और साधना के माध्यम से परमात्मा बनती है। परमात्मपद की ओर बढ़ने के लिए आत्मशोधन आवश्यक है। बोध से ही शोध की शुरुआत होती है।
आचरण से चरण होते हैं पूज्य
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति अपने आचरण और विचारों से ही पूज्य बनता है। मंदिर में भगवान की प्रतिमा विराजमान होने के बाद मंदिर की देहरी भी पूज्य हो जाती है। इसी प्रकार जिसकी चर्या विशुद्ध और आचरण पवित्र होता है, उसकी देह भी वंदनीय हो जाती है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके पद या बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से निर्धारित होती है। इसलिए जीवन में पवित्र आचरण और श्रेष्ठ विचारों को स्थान देना चाहिए।
पुण्य बढ़ाओ, यश पाओ
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति को अपना पुण्य बढ़ाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। प्रबल पुण्यात्मा का यश संसार में स्वयं फैलने लगता है। पुण्य के उदय से जंगल में भी मंगल हो जाता है। पुण्यशाली के गुणों का गान मनुष्य ही नहीं, देव भी करते हैं।
उन्होंने कहा कि पुण्य बहुत बलवान होता है और उसके प्रभाव से संसार के सुख एवं सफलताएं प्राप्त होती हैं। गर्भवती माता को भी अपने परिणामों को शुद्ध रखने और भोजन की शुद्धता का ध्यान रखने की आवश्यकता है। उन्होंने पुण्य को महाशक्ति बताते हुए जीवन में सत्कर्म और सद्भाव बढ़ाने का संदेश दिया।
धर्मसभा ने दिया आत्मशोधन का संदेश
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के प्रवचन से श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा मिली कि जीवन की वास्तविक ऊंचाई बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि शुद्ध विचार, श्रेष्ठ आचरण, आत्मचिंतन, संयम और पुण्य पुरुषार्थ में है। व्यक्ति अपने भीतर परिवर्तन लाकर स्वयं को श्रेष्ठ बना सकता है।



