देहरा-तिजारा। आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में प्राप्त होने वाली सुख-सुविधाएँ और अनुकूलताएँ केवल पुरुषार्थ का परिणाम नहीं, बल्कि धर्म और पुण्य का फल भी होती हैं। इसलिए अनुकूल परिस्थितियों में मनुष्य को धर्म को भूलना नहीं चाहिए। मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन और प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने दर्पण का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दर्पण की चमक उसके पीछे लगी पालिश के कारण दिखाई देती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में दिखाई देने वाली सुख-सुविधाओं के पीछे धर्म रूपी पालिश होती है। धर्म से विमुख होने पर जीवन निरसार हो जाता है।
जीवन से दुःखों का निर्मूलन संभव है
उन्होंने कहा कि “समस्त सुखों का कारण धर्म है।” मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अनुकूलताओं के समय धर्म को भूल जाता है। जब पुण्य का क्षय होता है और जीवन में दुःख आता है, तब अनेक उपाय करने पर भी दुःखों का नाश नहीं हो पाता। अपनी भूल सुधारकर पुनः धर्म का आश्रय लेने पर ही जीवन से दुःखों का निर्मूलन संभव है।
संस्कारमय संतान के निर्माण पर दिया संदेश
स्त्री और पुरुष पर्याय की महत्ता बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दाम्पत्य जीवन में माता-पिता के भावों और संस्कारों का प्रभाव संतान के जीवन पर पड़ता है। भोग-विलास की भावना से जन्मी संतान उसी दिशा में आगे बढ़ सकती है, जबकि संस्कारमय, संयममय और धर्मध्यानपूर्वक जीवन जीने वाले माता-पिता ऐसी संतान को जन्म दे सकते हैं, जो आगे चलकर महापुरुष बनकर अपने माता-पिता को गौरवान्वित करे।
संस्कारी संतान को जन्म दें
आचार्य श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि संतान को जन्म देना है तो ऐसी संतान को जन्म दें, जो धर्म मार्ग पर चलते हुए माता-पिता को मुनिराज अथवा आर्यिका के माता-पिता होने का गौरव प्रदान कर सके। इस अवसर पर मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन (पटेल), प्रचार मंत्री उमंग जैन, नीरज जैन, रवि जैन, नरेंद्र जैन (पूर्व अध्यक्ष), अनिल जैन एवं पवन जैन सहित श्रद्धालुजन उपस्थित रहे।




