मुनिश्री सुधासागर जी महाराज कटनी जिले क्षेत्र में जैन धर्म के अनुयायियों के बीच धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके नित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्म ज्ञान सुनने के लिए आ रहे हैं। कटनी से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर...
कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन के दौरान कहा कि विरोधियों में भी अनेक प्रकार के रहस्य होते हैे जो सामने वाले से मैचिंग नहीं करता, तद्रूप नहीं होता लेकिन सामने वाले का विरोध नहीं करता। दूसरा विरोधी वह होता है जो सामने वाले का नाश करता है, उसे दुश्मन बोलते है। विरोधी होना, विपरीत स्वभाव होना कोई बुरी चीज नहीं है बस तुम्हारी नियत कहीं सामने वाले का विनाश करने की तो नहीं है। नदी के दोनों किनारे मिलते नहीं है, मिलेंगे नहीं लेकिन, दोनों किनारे एक दूसरे को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते लेकिन विरोधी हैं। ये खोज है जैनदर्शन की, जिसका खोज करने वाला सिद्धान्त है स्याद्वाद। यदि तुम्हारे किसी से विचार नहीं मिलते हैं तो कोई बात नहीं, कहीं तुम सामने वाले के प्रति बुरे विचार तो नहीं कर रहे हो। एक दूसरे को मिलने नहीं देना लेकिन एक दूसरे का विनाश नहीं होने देना, इसका नाम है स्याद्वाद।गुरु रूपी मैनेजर की चाबी नहीं लगेगी

तुम्हारी जो सारी शक्तियाँ है वो बैंक के लॉकर में रखी हुई सम्पत्ति के समान है, वह तभी निकलती है जब बैंक मैनेजर की भी चाबी लगती है। ऐसे ही हमारी आत्मा की सम्पत्तियाँ है, हमारा सम्यकदर्शन, हमारा सम्यकज्ञान, हमारा सम्यकचारित्र ये सब निधि है लेकिन जब तक गुरु रूपी मैनेजर की चाबी नहीं लगेगी, तुम उस सम्पत्ति को भोग नहीं सकते। तीन चीजें विश्वसनीय नही है एक काललब्धि जो होना है सो निश्चित है, यही तुम्हारे विनाश का लक्षण है, सबसे अशुभ सूत्र है, उसी समय तुम्हारी सारी शक्तियाँ खत्म हो जाती है। साधु को कैसे दिख जाते है अंजुली में बाल जो तुम्हे बार बार शोधन करने पर भी नहीं दिखे क्योंकि तुम देख जरूर रहे हो लेकिन तुम्हारा उपयोग देखनें में नहीं है क्योंकि तुम्हारा देखने का व्रत नहीं है।

मैं भगवान के रथ का सारथी बना हूँ

भगवान या गुरु कोई ड्राइवर नहीं है जो हमारी जिंदगी चलाएंगे, वो मेरा भगवान है, वो मेरा गुरु है। कभी भगवान की गाड़ी चलाने का सौभाग्य मिले तो अहोभाग्य मानना, कभी भगवान से अपनी गाड़ी मत चलवाना। कभी भगवान के रथ का सारथी बनने का सौभाग्य मिले तो अहोभाग्य मानना कि धन्य है मेरा जीवन कि मैं भगवान के रथ का सारथी बना हूँ। अपनी जिंदगी को भगवान के भरोसे मत करना इसलिए तो जैन धर्म ने अपने सारे भगवानों को हाथ पर हाथ रखकर बनाया जो इस बात का प्रतीक है कि मैंने पालथी लगा ली है, मेरे भरोसे मत रहना कि भगवान आकर बचा लेगा। वो भगवान था, भगवान है और भगवान रहेगा, इसमे कोई शक नहीं है, भगवान पर भरोसा है लेकिन भगवान मेरे काम आएगा, भगवान मेरा कार्य कर देगा, ये मेरा बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।

भगवान को मात्र शगुन मानना,

कभी भूखों मर जाना लेकिन कभी ये भाव नहीं करना कि भगवान या महाराज मुझे एक रोटी खिला दे। मरने में बुराई नहीं है लेकिन गुरु के हाथ की रोटी खाना महान अपराध है। भगवान को मात्र शगुन मानना, भगवन! तेरे से जिंदगी चलाने के लिए नहीं आया हूँ, ये तो कहने की बाते हैं लेकिन तुझे छोडूंगा नहीं क्योंकि तेरे पास आये बिना गाड़ी सकुशल मेरे से चलेगी नहीं, इसलिए मैं आया हूँ। तू वो शक्ति है जो कुछ नहीं करती हैं लेकिन सारे जगत को करने की ताकत तू ही देता है।