आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में गुरुवार को आयोजित आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महामुनिराज के शिष्य मुनि श्री समत्व सागरजी महाराज, श्रमण मुनि श्री शील सागरजी महाराज, श्रमण मुनि श्री सुप्रभात सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में धर्म सभा का शुभारंभ हुआ। पदाधिकारियों ने आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज का चित्र अनावरण और मुनि श्री का पाद प्रक्षालन किया।

मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने धर्म सभा में कहा कि प्राणी अपने जीवन में उन स्थितियों से अपनी रक्षा करना चाहता है जो उसके अनुकूल नहीं हुआ करती। वे सारी की सारी परिस्थितियां, चाहे बाह्य की हों, चाहे अंतरंग की हों, जो मेरे अनुकूल ना हों, वही मेरे दुख का कारण हुआ करती हैं और मैं उन परिस्थितियों से कितना प्रभावित होता हूँ और अपने आप को संभाल नहीं पाता हूँ और दुख से घिर जाता हूँ।

जो योग्य नहीं वहीं आनंद का कारण बन रहा

ऐसा क्या किया जा सकता है, जिससे कि परिस्थितियाँ बिगड़ें, किंतु अंदर की मन:स्थिति वैसी की वैसी बनी रहे? मनास्थिति, बाहर की परिस्थितियाँ नहीं भी बिगड़ें, तो भी मनास्थिति बिगड़ी हुई दिखाई देती है। सब कुछ अच्छा होने पर भी अच्छा क्यों नहीं लगता है? सब कुछ होने पर भी अच्छा क्यों नहीं लगता है? यानी, कुछ जो अच्छा नहीं किया गया है, वही तुम्हारे अच्छा नहीं लगने का कारण हो जाता है। जो आपके द्वारा अच्छा नहीं किया गया है, वही आपके जीवन में ना अच्छा लगने का कारण हो जाता है। आपने जब-जब कोई ऐसा कार्य किया, जो करने योग्य नहीं है। आनंद दे रहा था, तब तो किया। आनंद लगता है, लेकिन तब किया जाता है वह कार्य, लेकिन वही कार्य बाद में पछतावा देता है।

जुआ विनाश का बनता कारण

एक जुआ बहुत अच्छा लगता है लोगों को। जुआ बहुत अच्छा लगता है लोगों को, लेकिन प्रारंभ में लगता है कि सब कुछ अच्छा होने वाला है, अब मैं बढ़ता जाऊँगा और बहुत आगे बढ़ जाऊँगा, लेकिन पहले खेलता है जुआ। थोड़े दिन खेलता है, बढ़ता भी दिखता है, अच्छा भी लगता है लेकिन, वही तुम्हारे दिन बिगाड़ने का कारण बन जाता है। कर्ज में जीव डूब जाता है। कर्ज के डूबने के साथ में अपने माता-पिता से, अपने परिवार जन से आँख नहीं मिला पाता है। अगर अपने संबंधियों से भी वह सहयोग के लिए जाए, सहयोग माँगने जाए तब भी उसके अंतरंग में थोड़ी सी असामंजस्य स्थिति बन जाती है कि मैंने गलत किया है। किस मुख से मैं किसी दूसरे के सामने जाऊँ। यह जुआ, शिकार, मद्य, माँस, मदिरा, जितने भी कार्य किए जाते हैं, वे सब व्यसन युक्त, पर स्त्री सेवन, वैश्या गमन, ये सारे के सारे कार्य नियम से तुम्हारे घर की बर्बादी करेंगे और आपकी मन:स्थिति को कभी भी अच्छा नहीं रहने देंगे।

सप्त व्यसन पाप का मूल है

इसलिए जिसे हम अभी धर्म के नाम से दूर रहने देते थे, आज अगर धर्म समझ लिया जाए और हर हृदय में धर्म व्याप्त हो जाए, तो पाप की प्रवृत्ति से जब निवृत्ति होगी, नियम से, आपके दिन बदल नहीं सकते। हम पाप करते हैं, तब बड़ा अच्छा लगता है। जगत के जितने लोग पाप कर रहे हैं, बड़े अच्छे लगते हैं और सप्त व्यसन पाप का मूल है। जब पाप करता दिखता है, तो खूब आनंदित होता है, लेकिन कितनी स्थितियाँ, परिस्थितियाँ घर की हों अथवा अंतरंग की हों, सब बिगड़ जाती हैं। मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया l

इस मौके पर रहे उपस्थित

इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीन जैन (पद्मावती), आनंद जैन, शैलेश जैन (लाला जी), मुकेश जैन , रमेश जैन, आशीष जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, सतेंद्र जैन (साहुल)आशीष जैन (बाबा), सचिन जैन(तार), आशु (वी.के), रोहित जैन, नितिन, सनी और मीडिया प्रभारी राहुल जैन सहित समस्त मंडल एवं सकल जैन समाज जन मौजूद रहे।