मुरैना। जैन दर्शन में सम्यग्दर्शन को आत्मकल्याण का प्रथम सोपान माना गया है। सम्यग्दर्शन की निर्मलता के लिए बताए गए दोषों में देवमूढ़ता, गुरु-मूढ़ता और लोकमूढ़ता प्रमुख हैं। गुरु-मूढ़ता का अर्थ ऐसे व्यक्ति को गुरु मान लेना है, जो वास्तव में आत्मकल्याण के मार्ग का पथप्रदर्शक न हो।
श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागर जी महाराज ने गुरु-मूढ़ता एवं कुगुरु विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि गुरु बनना और गुरु कहलाना दो अलग बातें हैं। केवल साधु का वेश धारण कर लेने से कोई सद्गुरु नहीं बन जाता।
ज्ञान, संयम और त्याग हैं गुरु की कसौटी
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में गुरु की पहचान बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उनके ज्ञान, संयम, त्याग, अपरिग्रह और आत्मकल्याण की साधना से होती है। सच्चा गुरु वही है, जो स्वयं राग-द्वेष, मोह और परिग्रह से दूर रहने का पुरुषार्थ करता है तथा दूसरों को भी आत्मसंयम और वीतरागता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि गुरु मनुष्य को केवल संसार की जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप की पहचान कराने वाला होना चाहिए। जैन परंपरा में आरंभ और परिग्रह से विरत, ज्ञान एवं संयम से युक्त साधु गुरु के रूप में आदर योग्य माने गए हैं।
श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक
आचार्यश्री ने कहा कि गुरु-मूढ़ता का मूल कारण विवेक का अभाव है। जब व्यक्ति चमत्कार, प्रसिद्धि, भीड़, बाहरी आडंबर, मधुर वाणी या सांसारिक लाभ देखकर किसी को गुरु मान लेता है, तो वह अपने आध्यात्मिक विवेक को कमजोर कर देता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जैन धर्म अंधानुकरण की शिक्षा नहीं देता। देव, शास्त्र और गुरु के वास्तविक स्वरूप को समझकर उत्पन्न श्रद्धा ही सार्थक है। जो व्यक्ति विषय-कषायों में लिप्त हो, आरंभ-परिग्रह में आसक्त हो और आत्मसंयम से दूर हो, उसे केवल बाहरी प्रभाव के कारण धर्मगुरु मान लेना उचित नहीं है।
सद्गुरु आत्मा की ओर मोड़ते हैं
आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे गुरु का कार्य भक्तों को अपने व्यक्तित्व में बांधना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मा की ओर मोड़ना है। सद्गुरु संसार के आकर्षण बढ़ाने के बजाय उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं तथा शिष्य को जिनवाणी, तत्त्वज्ञान, संयम, तप और आत्मचिंतन से जोड़ते हैं।
गुरु वही, जो आत्मा की राह दिखाए
मुनिश्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि गुरु वह नहीं जो जीव को संसार में उलझाए, बल्कि वह है जो संसार से ऊपर उठने की राह बताए। गुरु की पहचान बाहरी वेश से नहीं, बल्कि उनके संयम, त्याग, ज्ञान और आचरण से करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कुगुरु के प्रति अंधश्रद्धा गुरु-मूढ़ता है, जबकि सद्गुरु के उपदेशों को विवेकपूर्वक स्वीकार कर आचरण में उतारना सम्यग्दर्शन की दिशा है। केवल चरण स्पर्श, पूजा या जयकारे पर्याप्त नहीं हैं; अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलना ही वास्तविक गुरुभक्ति है।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





