मुरैना। ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु के चरणों में रहकर उनके उपदेशों को जीवन में आत्मसात करने से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। गुरु के प्रति निस्वार्थ समर्पण और विनय का भाव आवश्यक है, क्योंकि विनय के बिना वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है।
आचार्यश्री अभिनंदनसागरजी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि गुरु शिष्य को हेय और उपादेय का विवेक कराते हैं। जीवन में क्या ग्रहण करना चाहिए, क्या त्यागना चाहिए तथा कौन-सा कार्य उचित-अनुचित है, इसका बोध गुरु के मार्गदर्शन से होता है।
बहुमानाचार, उपधानाचार और अनिन्ह्वाचार का महत्व
आचार्यश्री ने ज्ञानाराधना के महत्वपूर्ण अंगों बहुमानाचार, उपधानाचार और अनिन्ह्वाचार की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि बहुमानाचार का अर्थ देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान तथा विनय का भाव रखना है।
उपधानाचार के संबंध में उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अध्ययन के दौरान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु के त्याग का संकल्प लेना उपधानाचार है। इससे ज्ञान के साथ त्याग, संयम और आत्मानुशासन की भावना विकसित होती है।
अनिन्ह्वाचार का अर्थ समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जिस गुरु से ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उनका नाम नहीं छिपाना चाहिए। गुरु के ज्ञानोपकार को स्वीकार करना और उनके प्रति कृतज्ञ रहना प्रत्येक शिष्य का कर्तव्य है।
गुरु से मिले ज्ञान को आचरण में उतारें
मुनि श्री 108 उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि आध्यात्मिक उत्थान की शुरुआत गुरु के मार्गदर्शन से होती है। गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और उपदेशों के माध्यम से शिष्य को सही दिशा देते हैं।
उन्होंने कहा कि गुरु का सान्निध्य तभी सार्थक होता है, जब शिष्य विनय रखे, उपदेशों का सम्मान करे और बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करे। सच्चा शिष्य वही है, जो गुरु से प्राप्त ज्ञान को आचरण में उतारकर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़े।
धर्मसभा का संचालन
धर्मसभा का संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। मंगलाचरण अरविंद जैन ने प्रस्तुत किया। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन आकाश जैन पोरसा वाले, आकाश जैन तथा अरविंद जैन जैन बगीची द्वारा किया गया।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





