दिल्ली। मनुष्य जीवन की दुर्लभता को समझें दिल्ली में विराजित दिगंबर जैन श्रमण-संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन अनमोल है और अत्यंत दुर्लभता से प्राप्त हुआ है। इसलिए व्यक्ति को प्रत्येक क्षण जाग्रत रहकर अच्छे और कुशल कार्य करने चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का एक छोटा-सा प्रयास भी किसी के जीवन को रोशन कर सकता है। जैसे सूर्य की एक किरण अंधकार को नष्ट कर देती है, गुरु की एक सीख जीवन की दिशा बदल सकती है और अग्नि की एक चिंगारी विशाल ईंधन को भस्म कर सकती है, उसी प्रकार जीवन में छोटी-सी भूल, चूक या कषाय भी बड़ा परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
एक निर्णय बदल सकता है जीवन की धारा
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि एक शत्रु जीवन में अशांति ला सकता है, एक भूल जीवन में शूल बन सकती है और एक चूक जीवन का अंत तक कर सकती है। वहीं एक सही निर्णय जीवन की पूरी धारा को बदल सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक वोट से नेता चुनाव हार सकता है, एक अंक से विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो सकता है और एक बूंद विष पूरे भोजन को विषाक्त कर सकती है। इसी प्रकार कषाय की एक छोटी-सी कणिका साधक की साधना को भंग कर सकती है।
उन्होंने कहा कि एक बूंद से जीव का जन्म होता है और वही एक बूंद सीप में गिरकर मोती बन जाती है। इसी तरह एक क्षण की कषाय भी व्यक्ति को कलंकित कर सकती है। इसलिए जीवन में हर क्षण सजग रहना आवश्यक है।
सत्य जानो, सत्य मानो
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि सत्य को जानने के लिए पुरुषार्थ आवश्यक है। सत्य को जानना कठिन है और सत्य को जानना तथा उसे स्वीकार करना अत्यंत दुर्लभ है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति सत्य को नहीं जानने के कारण ही अनेक प्रकार के दुःखों में उलझता है। इसलिए जीवन में सत्य की खोज, सत्य का ज्ञान और सत्य को स्वीकार करने का भाव होना चाहिए।
गुरु का आशीष और बुजुर्गों का सम्मान ही घर का वास्तविक वास्तु
घर के वास्तु के संदर्भ में पट्टाचार्य श्री ने कहा कि जिस घर में गुरु का आशीर्वाद नहीं और बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान नहीं, उस घर का वास्तु कभी ठीक नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि कटु वचन भी घर के वास्तु को खराब करते हैं। यदि घर को स्वर्ग बनाना है तो परिवार के सदस्यों को परस्पर विनय करनी चाहिए और मिश्री से भी अधिक मधुर वाणी बोलनी चाहिए।
उन्होंने संतुलित शाकाहार पर भी जोर देते हुए कहा कि भोजन सही होगा तो घर का वातावरण भी अच्छा रहेगा। परिवार में परस्पर प्रेम और वात्सल्य ही घर के वास्तविक वास्तु को ठीक करता है।
भाव मंगल हों तो सब मंगल
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि कषाय से उत्पन्न अशुभ भाव और अशुभ भाषा जीवन में अमंगल का कारण बनते हैं। भावों का मंगल होना ही प्रधान मंगल है। जब भाव मंगलमय होते हैं तो जीवन में सब कुछ मंगलमय होने लगता है।
उन्होंने कहा कि जीवन को मंगलमय बनाना है तो सबसे पहले अपने भावों को मंगल बनाना होगा। स्वादिष्ट एवं संतुलित भोजन, मधुर और विनयपूर्ण वाणी, सादे वस्त्र, पर्याप्त एवं उचित आहार, स्वच्छ वायु तथा प्रसन्न मुख-मुद्रा भी जीवन में सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक हैं।
उत्साह महान शक्ति है
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपना बनाना हो तो उसकी प्रशंसा करें। उत्साह बहुत बड़ी शक्ति है। प्रशंसा और पुरस्कार से व्यक्ति के भीतर उत्साह का संचार होता है।
उन्होंने कहा कि सफलता के लिए उमंग और उत्साह अत्यंत आवश्यक हैं। उत्साहपूर्वक किया गया कार्य व्यक्ति को विशिष्ट परिणाम प्रदान करता है। इसलिए स्वयं उत्साहित रहें और दूसरों के भीतर भी उत्साह जगाने का प्रयास करें।
धर्मसभा का संदेश
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के प्रवचन में मनुष्य जीवन की सार्थकता, सजगता, सत्य, पारिवारिक प्रेम, विनय, सकारात्मक भाव और उत्साह को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा दी गई। उन्होंने छोटी-छोटी बातों के बड़े प्रभाव को समझाते हुए प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों, वाणी और कर्मों के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया



