महरौनी। दशलक्षण महापर्व के अवसर पर नगर के श्री अजितनाथ बड़ा जैन मंदिर में धर्म और संस्कृति का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है। मुनि श्री विकौशलसागर महाराज के मंगल सान्निध्य में प्रतिदिन जिनाभिषेक, शांतिधारा एवं सामूहिक दशलक्षण पूजन हो रहे हैं। सुबह से ही मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की उपस्थिति और धार्मिक गतिविधियों से भक्तिमय बना हुआ है।
तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं
मुनि श्री विकौशलसागर महाराज ने उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और कषायों के क्षय की साधना है। तप के माध्यम से व्यक्ति इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर आगे बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि बाहरी तप के साथ आंतरिक तप का महत्व भी समझना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपनी आसक्तियों, इच्छाओं और विकारों पर नियंत्रण करता है, तभी तप की साधना सार्थक होती है। श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के प्रवचन एकाग्रता के साथ सुने।
महिला मंडल के नाटक ने बांधा समां
महापर्व के धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। महिला मंडल द्वारा ‘शरद पूर्णिमा के दो चांद’ नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से सामाजिक एवं पारिवारिक भावनाओं को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसे दर्शकों ने सराहा।
रंगोली और भजन प्रतियोगिता के विजेता
रंगोली प्रतियोगिता में पलक पारोल ने प्रथम, दीपा लौडुआ ने द्वितीय और तन्वी सतभैया ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
भजन प्रतियोगिता में सनिल जैन प्रथम, ममता सराफ द्वितीय तथा अंकी चौधरी तृतीय स्थान पर रहीं। आयोजन समिति एवं समाजजनों ने सभी विजेताओं को बधाई दी।
अन्य जिनालयों में भी धार्मिक आयोजन
नगर के श्री यशोदय तीर्थ, श्री शांतिनाथ जिनालय और श्री चंद्रप्रभु जिनालय में भी अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, प्रवचन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। दशलक्षण महापर्व के कारण महरौनी का वातावरण पूरी तरह धर्ममय बना हुआ है।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई





