Jainism_and_the_message_of_Lord_Krishna

श्रीकृष्ण का नाम भारतीय संस्कृति में प्रेम, नीति, शौर्य, बुद्धिमत्ता और लोकमंगल के साथ जुड़ा हुआ है। जन्माष्टमी के अवसर पर जब पूरा देश भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में आनंदित होता है, तब यह जानना भी रोचक है कि जैन धर्म में श्रीकृष्ण का स्वरूप किस प्रकार वर्णित हुआ है।

जैन परंपरा में श्रीकृष्ण को केवल एक धार्मिक देवता के रूप में नहीं बल्कि शलाका पुरुषों की परंपरा में वर्णित एक महान पुरुष- वासुदेव के रूप में स्वीकार किया गया है। जैन पुराण साहित्य में उनके जीवन, परिवार, पराक्रम और आध्यात्मिक यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

त्रिषष्टि शलाका पुरुष और श्रीकृष्ण

जैन दर्शन में 63 शलाका पुरुषों का विशेष महत्व है। इनमें 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9 वासुदेव और 9 प्रतिवासुदेव माने गए हैं। इसी परंपरा में श्रीकृष्ण को नव वासुदेवों में से एक माना गया है। उनके बड़े भाई बलराम को बलदेव के रूप में वर्णित किया गया है। जैन ग्रंथों में कृष्ण के जीवन का वर्णन विशेष रूप से हरिवंश पुराण, त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित और अन्य जैन पुराण साहित्य में मिलता है।

कृष्ण और बलराम

जैन परंपरा में कृष्ण और बलराम का संबंध केवल भाई का नहीं, बल्कि एक विशेष आध्यात्मिक-सांसारिक व्यवस्था का प्रतीक है। बलराम को अपेक्षाकृत अहिंसक और सात्त्विक प्रवृत्ति के बलदेव के रूप में चित्रित किया गया है, जबकि कृष्ण को वासुदेव अर्थात् अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी पुरुष के रूप में। जैन दृष्टि से यह कथा यह संदेश देती है कि संसार में महान शक्ति और विजय प्राप्त कर लेना ही आत्मकल्याण का अंतिम लक्ष्य नहीं है।

कृष्ण का जीवन और जैन दर्शन

जैन धर्म का मूल संदेश है—

“अहिंसा परमो धर्मः”

लेकिन जैन दर्शन केवल बाहरी हिंसा की बात नहीं करता। वह मन, वचन और कर्म की शुद्धि तथा राग-द्वेष से मुक्ति को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। कृष्ण का जीवन जैन दृष्टि से इसी संसार और अध्यात्म के द्वंद्व को समझने का एक माध्यम बन जाता है। उन्होंने संसार में रहते हुए अपार शक्ति, प्रतिष्ठा और वैभव प्राप्त किया, लेकिन जैन कर्म सिद्धांत के अनुसार सांसारिक कर्मों का फल व्यक्ति को भोगना ही पड़ता है। यही कारण है कि जैन परंपरा में कृष्ण का चरित्र केवल विजय की कहानी नहीं है, बल्कि कर्म और उसके परिणाम की शिक्षा भी देता है।

जैन परंपरा में कृष्ण का भविष्

जैन कथानक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट पक्ष यह है कि कृष्ण के संबंध में यह माना गया है कि वर्तमान जीवन में उनके द्वारा किए गए कर्मों के कारण उन्हें आगे कर्मफल भोगना पड़ता है परंतु जैन धर्म का सबसे सुंदर सिद्धांत यही है कि- कोई भी जीव सदा के लिए बंधा हुआ नहीं है।कर्मों का क्षय करके प्रत्येक आत्मा मोक्ष प्राप्त कर सकती है। इसलिए जैन दृष्टि से कृष्ण की कथा भी अंततः आत्मा की अनंत संभावनाओं की कथा है।

कृष्ण और जैन धर्म में अहिंसा का प्रश्न

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। हिंदू परंपरा में श्रीकृष्ण को भगवान और धर्मसंस्थापक के रूप में पूजा जाता है तथा महाभारत और गीता में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वहीं जैन परंपरा में कृष्ण को वासुदेव के रूप में देखा जाता है। वे तीर्थंकर नहीं हैं और जैन दर्शन में उन्हें मोक्ष मार्ग का उपदेश देने वाले तीर्थंकर के रूप में नहीं माना गया है। जैन धर्म में सर्वोच्च आदर्श तीर्थंकर हैं, जिन्होंने राग-द्वेष और कर्मों का पूर्ण क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त किया तथा संसार को मोक्षमार्ग दिखाया। इसलिए जैन दृष्टि से कृष्ण महान पुरुष अवश्य हैं, लेकिन तीर्थंकर नहीं।

एक सुंदर सांस्कृतिक संग

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की विशालता का उदाहरण है। एक ही कृष्ण को अलग-अलग भारतीय धार्मिक परंपराएँ अपने-अपने दार्शनिक दृष्टिकोण से देखती हैं। जैन परंपरा ने कृष्ण को अपने कर्म सिद्धांत, अहिंसा, अनेकांत और आत्मकल्याण की दृष्टि से समझा।यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि यहाँ किसी महान व्यक्तित्व को समझने के लिए अनेक दृष्टिकोण साथ-साथ विकसित हुए।

जन्माष्टमी का जैन दृष्टिकोण से संदेश

जन्माष्टमी केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी हो सकता है।

कृष्ण का जीवन हमें बताता है कि शक्ति मिले तो उसका सदुपयोग करें,बुद्धि मिले तो उसका उपयोग लोकहित में करें, समृद्धि मिले तो अहंकार न करें और जीवन मिले तो अंततः आत्मकल्याण का मार्ग खोजें।

जैन धर्म हमें इससे एक कदम आगे ले जाकर कहता है कि बाहरी विजय से बड़ी विजय स्वयं पर विजय है।

दूसरों को जीतने से बड़ी उपलब्धि अपने राग-द्वेष को जीतना है। इसीलिए भगवान महावीर का संदेश—

“परस्परोपग्रहो जीवानाम्”

और जैन धर्म का अहिंसा एवं अपरिग्रह का मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

अंतिम संदेश

श्रीकृष्ण भारतीय जनमानस के अत्यंत प्रिय पुरुष हैं। जैन परंपरा में उनका स्थान नव वासुदेवों में एक महान पुरुष के रूप में है।

उनकी कथा हमें यह स्मरण कराती है कि संसार में चाहे कितनी भी शक्ति, संपत्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाए, कर्म के नियम से कोई नहीं बच सकता।

और यही जैन दर्शन का शाश्वत संदेश है—

“सच्ची विजय संसार पर नहीं, स्वयं पर विजय है;

सच्चा वैभव बाहरी संपत्ति नहीं, आत्मा की निर्मलता है;

और अंतिम लक्ष्य सांसारिक सुख नहीं, मोक्ष है।”

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेते हुए अहिंसा, संयम, करुणा और आत्मचिंतन को अपने जीवन में स्थान दें।

जय जिनेन्द्र।