कुण्डलपुर (म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत उत्तम त्याग धर्म के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर महाराज ने कहा कि त्याग केवल वस्तुओं को छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति, संग्रह की प्रवृत्ति और अहंकार को छोड़ने की साधना है। जीवन में जितना ग्रहण आवश्यक है, उतना ही त्याग भी आवश्यक है। त्याग जीवन को हल्का, स्वस्थ और सार्थक बनाता है।
पर्व जोड़ते हैं समाज को
मुनि श्री ने कहा कि पर्व समाज को जोड़ने और साधक के भीतर समता का भाव जगाने का माध्यम हैं। संस्कृत में पर्व का अर्थ संधि, गांठ अथवा पोर भी है। जिस प्रकार गन्ने के पोर उसके रस को जोड़े रखते हैं, उसी प्रकार धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक पर्व समाज में समरसता का भाव विकसित करते हैं। पर्व की आत्मा को समझकर उसे जीवन में उतारना ही वास्तविक पर्व-आराधना है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति भी त्याग का संदेश देती है। पेड़ों से पत्ते झड़ते हैं, फल पककर गिरते हैं और शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकलने पर स्वास्थ्य बना रहता है। जैसे सांस लेना जरूरी है, वैसे ही सांस छोड़ना भी आवश्यक है। त्याग जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया और धर्म का स्वरूप है।
संग्रह नहीं, सदुपयोग बने संस्कार
मुनि श्री ने कहा कि आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को रोककर रखना परिग्रह है। मनुष्य को कम से कम में जीवन चलाने की आदत विकसित करनी चाहिए। यदि किसी के पास आवश्यकता से अधिक वस्तु, धन या सामर्थ्य है तो उसे जनहित और जरूरतमंदों के लिए उपयोग में लाना चाहिए।
बादल और समुद्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि समुद्र में अथाह जल होते हुए भी वह खारा है, जबकि बादल सीमित जल को रोककर नहीं रखते। बरसकर वे धरती में हरियाली, जीवन में खुशहाली और वातावरण में शीतलता लाते हैं। धन, ज्ञान और सामर्थ्य की सार्थकता भी उनके सदुपयोग में है।
उन्होंने कहा कि पुरुषार्थ और पुण्य से अर्जित धन को सुरक्षित रखना अनुचित नहीं, किंतु श्रेष्ठ अवसर आने पर उसे धर्म, समाज और जनहित में लगाने की भावना होनी चाहिए। मंदिर निर्माण, पंचकल्याणक, संस्कार शिविर, पाठशाला, गौशाला तथा धार्मिक विधि-विधानों में सहयोग त्याग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
दान में प्रदर्शन नहीं, समर्पण जरूरी
मुनि श्री ने कहा कि दान का महत्व प्रचार या पहचान में नहीं, बल्कि समर्पण की भावना में है। धर्म के लिए समय निकालना भी त्याग है। पर्युषण और दशलक्षण पर्व में व्यापारी एवं नौकरीपेशा लोग अपनी व्यस्तताओं से समय निकालकर परिवार सहित धर्मध्यान कर रहे हैं। संकल्पपूर्वक धर्म से जुड़ना और परिवार को संस्कारित करना त्याग की भावना को जीवन का संस्कार बनाता है।
धन, ज्ञान और शक्ति का सदुपयोग
मुनि श्री ने धन, ज्ञान और बल को जीवन की तीन महत्वपूर्ण शक्तियां बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान का उपयोग समाजहित में, धन का उपयोग दान और सहयोग में तथा शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा में होना चाहिए। इनका दुरुपयोग विवाद, अहंकार और पीड़ा का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि त्याग का भी अहंकार नहीं करना चाहिए, बल्कि अहंकार का त्याग करना चाहिए। वास्तविक ज्ञान वही है, जो व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार की पहचान कर उससे मुक्त होने की प्रेरणा दे।
अनंत चतुर्दशी पर मोक्ष कल्याणक महोत्सव
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि कार्यक्रम में ऐलक श्री आगतसागरजी महाराज ने भी संबोधित किया, जबकि ऐलक श्री चैत्यसागरजी महाराज ने तत्वार्थ सूत्र के आठवें अध्याय की व्याख्या की। संगीतमय महाआरती का आयोजन भी हुआ।
25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर भगवान श्री वासुपूज्यजी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। दोपहर में शिखर मंदिर से श्रीजी को विमान में विराजमान कर मुनि संघ के सान्निध्य में गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। शोभायात्रा कुण्डलपुर नगर भ्रमण करते हुए शिविर पंडाल पहुंचेगी, जहां धार्मिक कार्यक्रमों के साथ जलविहार आयोजित होगा।




