कुण्डलपुर (म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत संस्कार शिविर के नौवें दिन निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागरजी महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भाव ही जीवन के बंधन का मुख्य कारण है। आकिंचन्य धर्म साधक को उस स्थिति तक पहुंचने की प्रेरणा देता है, जहां वह अनुभव करता है—न कुछ मेरा है, न कुछ तेरा।
उन्होंने कहा कि जो वस्तु आज हमारे पास है, वह न हमारे साथ आई है और न हमारे साथ जाएगी। जीवन चिड़िया के रैन बसेरे जैसा है—कुछ समय का डेरा और फिर आगे की यात्रा।
ममत्व की चार अवस्थाएं
मुनिश्री ने भरत-बाहुबली के प्रसंग से ममत्व की चार अवस्थाओं को समझाया—
- ‘मेरा तो मेरा है ही, तेरा भी मेरा’—अपनी आवश्यकता पूरी होने के बाद भी दूसरे के अधिकार पर दृष्टि रखना।
- ‘मेरा मेरा और तेरा तेरा’—न दूसरे की वस्तु लेना और न अपनी वस्तु किसी को देना।
- ‘तेरा तो तेरा है ही, संतोष नहीं है तो मेरा भी तेरा’—अपनी वस्तु भी दूसरे के लिए छोड़ने की भावना।
- ‘न यह मेरा है, न यह तेरा है’—यही आकिंचन्य धर्म की वास्तविक दिशा है।
भरत-बाहुबली का वैराग्य प्रसंग
मुनिश्री ने कहा कि चक्रवर्ती भरत की दिग्विजय पूर्ण होने के बाद भी उनका चक्ररत्न बाहुबली की सीमा में प्रवेश नहीं कर रहा था। सत्ता-विस्तार की भावना से विवाद युद्ध तक पहुंच गया। तीनों युद्धों में बाहुबली के सामने भरत को पराजय मिली।
निर्णायक क्षण में भरत ने आवेश में चक्र चला दिया। उसी समय बाहुबली को सत्ता, संपदा और वैभव की असारता का बोध हुआ। उनमें वैराग्य जागा और उन्होंने कहा—“भैया भरत, तेरा तो तेरा है ही, संतोष नहीं है तो मेरा भी तेरा संभालो, मैं जाता हूं।” इसके बाद वे आत्मसाधना की ओर बढ़ गए।
वस्तु नहीं, मन की पकड़ छोड़ना जरूरी
मुनिश्री ने सेठ और पुराने सेवक का दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि वर्षों पुरानी कीमती घड़ी टूटने पर सेठ ने सेवक को क्षमा तो कर दिया, लेकिन वह रातभर घड़ी के नुकसान में उलझा रहा। इससे स्पष्ट होता है कि वस्तु का छूट जाना पर्याप्त नहीं; उसके प्रति मन का मोह छूटना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण की यात्रा क्षमा से शुरू होकर आकिंचन्य तक आती है। यहां केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि ‘मैंने त्याग किया’ इस भाव का भी त्याग करना है। मन की निर्विकल्पता ही वास्तविक सुख और शांति देती है।
साधना को जीवन में उतारें
मुनिश्री ने शिविरार्थियों से कहा कि शिविर में सीखे सूत्रों को केवल दस दिनों तक सीमित न रखें, बल्कि वर्षभर जीवन में उनका प्रयोग करें। धर्म के लिए पहल करने वाले को भीड़ का इंतजार नहीं करना चाहिए। छोटे स्तर पर संस्कार शिविर और आराधना आरंभ कर धर्मपरंपरा को आगे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि वाणी और व्यवहार का प्रभाव तभी होता है, जब वे समय, विषय और प्रसंग के अनुरूप हों।
अनंत चतुर्दशी पर निर्वाण लाडू
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर प्रातः अभिषेक एवं शांतिधारा के उपरांत भगवान वासुपूज्य के निर्वाण कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई





