कुण्डलपुर। निर्यापक मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक सार समझने के लिए केवल देखना, जानना और चलना पर्याप्त नहीं है। सही दृष्टि, सम्यक ज्ञान और सदाचरण के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आचार्यों की सूक्तियां और शास्त्रों के सूत्र केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे व्यावहारिक जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग भी दिखाते हैं।

रत्नत्रय जीवन को देता है सही दिशा

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनिश्री ने तत्वार्थ सूत्र के सूत्र—‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः’—का व्यावहारिक अर्थ समझाया।

उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का अर्थ है सही दृष्टि से देखना, सही ढंग से समझना और उसके अनुरूप आचरण करना। गलत दृष्टि, गलत समझ और गलत आचरण व्यक्ति को लक्ष्य से दूर कर सकते हैं।

बाहरी संसार नहीं, अंतर्मन को देखें

मुनिश्री ने आचार्य श्री के दोहे—‘खिड़की से क्यों देखता, दिखे दुखद संसार…’—के माध्यम से आत्मचिंतन की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मकान केवल ईंट-पत्थर की इमारत है, जबकि प्रेम, अपनत्व और संबंधों से घर बनता है। जीवन का सुख भी बाहरी साधनों से अधिक भीतर के भावों पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर बाहरी परिस्थितियों को ही सुख-दुख का आधार बना लेता है। इच्छा पूरी न होने या अपेक्षा के अनुरूप व्यवहार न मिलने पर संसार दुखद प्रतीत होने लगता है। इसलिए दूसरों की कमियां देखने के बजाय अपने विचारों, अपेक्षाओं और व्यवहार का परीक्षण करना चाहिए।

परिस्थितिजन्य नहीं, वास्तविक वैराग्य आवश्यक

मुनि श्री ने राग और वैराग्य के अंतर को समझाते हुए कहा कि प्रतिकूल परिस्थिति से परेशान होकर घर छोड़ने का विचार कर लेना वास्तविक वैराग्य नहीं है। सच्चा वैराग्य संसार के परिवर्तनशील स्वरूप को समझने से उत्पन्न होता है।

उन्होंने कहा कि बाहरी अनुकूलताएं स्थायी सुख नहीं देतीं। वास्तविकता के ज्ञान से विकसित वैराग्य ही स्थायी और आत्मकल्याणकारी होता है।

धर्म से बदलती है जीवन-दृष्टि

सांगली नगर के एक प्रसंग के माध्यम से मुनिश्री ने कहा कि जहां धर्म, सद्विचार और सदाचरण का प्रभाव होता है, वहां जीवन को देखने की दृष्टि बदल जाती है। धर्म केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से बड़े बाबा के दर्शन, भक्ति, अभिषेक और शांतिधारा में सहभागी बनने तथा संपूर्ण सिद्धक्षेत्र की वंदना करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रा से ऐसे विचार और संकल्प लेकर जाना चाहिए, जो जीवन को धर्ममय बनाने में सहायक हों।

गुरु परंपरा समारोह में सहभागिता का आह्वान

मुनि श्री ने 24 एवं 25 अक्टूबर को कुण्डलपुर में आयोजित होने वाले गुरु परंपरा समर्पण समारोह का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु-परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उसके आदर्शों को जीवन में उतारना आवश्यक है। उनके अनुसार, समारोह गुणानुवाद के साथ समाज को प्रेरणा देने का माध्यम बनेगा।

श्रीफल साथी : कुण्डलपुर