कुण्डलपुर (दमोह)। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के तत्वावधान में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज एवं मुनि श्री पवित्रसागर महाराज ससंघ के चातुर्मास कलश स्थापना समारोह का भव्य आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मध्यप्रदेश सहित देश के विभिन्न नगरों से हजारों श्रद्धालु, युवा एवं महिला मंडल बड़ी संख्या में शामिल हुए।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' एवं कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र के प्रचार मंत्री जय कुमार जैन 'जलज' ने बताया कि सागर, दमोह, हटा, पथरिया, जबलपुर, कटनी, सतना, ललितपुर, बीना, अशोकनगर, विदिशा, भोपाल सहित अनेक स्थानों से श्रद्धालु कुण्डलपुर पहुंचे।

बड़े बाबा के दरबार में धार्मिक अनुष्ठान

प्रातःकाल बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के दिव्य दरबार में अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन के साथ चातुर्मास स्थापना से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। धार्मिक क्रियाओं के बीच पूरा तीर्थक्षेत्र भक्तिभाव एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत नजर आया।

चातुर्मास आत्मचिंतन और संयम का अवसर

धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि जैन परंपरा में वर्षायोग और चातुर्मास का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह केवल संतों के लिए साधना, स्वाध्याय, तप और आत्मानुशासन का काल नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी आत्मचिंतन, संयम, भक्ति और आराधना के माध्यम से जीवन को नई दिशा देने का श्रेष्ठ अवसर है।

उन्होंने कहा कि वर्षाकाल में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ जाती है। अहिंसा धर्म का पालन हो सके, इसलिए महाव्रती संत एक स्थान पर रहकर धर्माराधना करते हैं। इस दौरान धार्मिक पर्वों की अधिकता और संतों का सान्निध्य वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

त्यागियों के सान्निध्य से आता है परिवर्तन

मुनिश्री ने कहा कि जिस नगर या क्षेत्र में चातुर्मास करने वाले पिच्छीधारी संत विराजते हैं, वहां धर्म की चेतना स्वतः जागृत होती है। संतों का सान्निध्य व्यक्ति के भीतर परिवर्तन का माध्यम बनता है।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ भले स्वयं संयमी न हो, लेकिन यदि वह नियमित रूप से संयमी संतों के संपर्क में रहेगा तो उसके भीतर भी त्याग और संयम के संस्कार विकसित होंगे। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के वचनों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि त्यागी का सान्निध्य स्वयं त्याग की प्रेरणा देता है।

मुनिश्री ने कहा कि वे किसी से तुरंत त्याग करने का आग्रह नहीं करते। पहले त्यागियों के पास आना प्रारंभ कीजिए, परिवर्तन अपने आप होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे पके हुए खरबूजे के पास रखे कच्चे खरबूजे भी धीरे-धीरे अपना रंग बदल लेते हैं, वैसे ही संयमी और तपस्वी संतों का सान्निध्य गृहस्थ के अंतरंग को बदल देता है।

सम्यग्दृष्टि जीवन को देती है नई दिशा

मुनिश्री ने कहा कि मुक्ति मार्ग में संयमी साधक आगे बढ़ते हैं और सम्यग्दृष्टि गृहस्थ उनके पदचिह्नों पर चलकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का प्रयास करते हैं। लक्ष्य दोनों का आत्मकल्याण ही होता है, केवल वर्तमान अवस्था अलग-अलग होती है।

सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि का अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों संसार में रहते हैं, लेकिन उनका दृष्टिकोण अलग होता है। मिथ्यादृष्टि संसार को ही सब कुछ मानता है, जबकि सम्यग्दृष्टि संसार में रहते हुए भी उसे अंतिम सत्य नहीं मानता और संयम की ओर आगे बढ़ने की भावना रखता है।

युवाओं को दिया आत्मचिंतन का संदेश

मुनिश्री ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि नई पीढ़ी में प्रतिभा और उत्साह की कमी नहीं है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में अनेक युवा दुविधा, तनाव और मानसिक अशांति से जूझ रहे हैं। उच्च शिक्षा, आकर्षक वेतन और आधुनिक सुविधाओं के बावजूद जीवन में शांति नहीं है, क्योंकि इच्छाओं, भावनाओं और जीवन की दिशा का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने कहा कि इच्छाओं की समीक्षा, अनुशासित दिनचर्या, भावनाओं पर नियंत्रण और श्रेष्ठ संगति से जीवन में वास्तविक सुख और शांति प्राप्त की जा सकती है।

मुनिश्री ने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, “ग्रंथों को पढ़ो या न पढ़ो, लेकिन अपने आपको अवश्य पढ़ो।” उन्होंने कहा कि संसार की प्रत्येक भाषा सिखाने वाले शिक्षक मिल जाएंगे, लेकिन जीवन की पुस्तक पढ़ना भाव-विज्ञान का विषय है। अपने अंतर्मन को समझने की शिक्षा ज्ञानी गुरु ही दे सकते हैं।

आचार्य विद्यासागर महाराज की दिव्य दृष्टि का स्मरण

मुनिश्री ने समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने कभी किसी का बायोडाटा या कुंडली नहीं देखी। उनकी दिव्य दृष्टि ही व्यक्ति की पात्रता, संस्कार और भावों को पहचान लेती थी। उसी आधार पर वे प्रत्येक व्यक्ति को उसके अनुरूप मार्गदर्शन प्रदान करते थे।

उन्होंने कहा कि संत परंपरा की विशेषता यही है कि वह मनुष्य के भीतर छिपी आध्यात्मिक संभावनाओं को जागृत करती है।

25 से अधिक महिला मंडलों ने की सहभागिता

बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के दरबार में अभिषेक, शांतिधारा एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। चातुर्मास कलश स्थापना समारोह में मंगलाचरण एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।

देशभर से आए श्रद्धालुओं एवं 25 से अधिक महिला मंडलों ने उत्साहपूर्वक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य समयसागर जी महाराज की पूजन में सहभागिता की और अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ लिया।

बिना बोली के स्थापित हुए कलश

प्रतिष्ठाचार्य वाणी भूषण विनय भैया बंड़ा के कुशल निर्देशन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। संचालन के दौरान श्रद्धालुओं ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ अपनी भावना के अनुरूप बिना बोली लगाए विभिन्न चातुर्मास कलश स्थापित किए

चातुर्मास कलश का सौभाग्य प्रमुख कलश श्रेष्ठी सीए कवीश जैन जी दिल्ली, बड़े बाबा कलश प्रशांत जी मुंबई, ज्ञानकलश चंद्रकुमार जैन सराफ अध्यक्ष कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी, गुरुवर छोटे बाबा कलश उत्तमचंद जी कोयला परिवार कटनी, श्रीधर स्वामी कलश उत्तमचंद जी बेगमगंज, चौ. मनोज जैन मीनू, सिद्धि कलश आरके जैन महामंत्री को प्राप्त हुआ।

अन्य कलशों की स्थापना का सौभाग्य अशोक सराफ, प्रमोद सराफ पटेरा, पदमचंद खली वाले, अजय जैन निरमा, सेठ शीलचंद नोहटा, अमित त्यागी, पदमचंद जुझार, संतोष सिंघई पूर्व अध्यक्ष सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ।

श्रद्धालुओं एवं पदाधिकारियों की सहभागित

इस अवसर पर समाज के अनेक पदाधिकारी, विभिन्न नगरों से आए श्रद्धालु परिवार, सेवाभावी कार्यकर्ता एवं त्यागीवृत्ति वाले परिवार उपस्थित रहे। सम्पूर्ण आयोजन श्रद्धा, अनुशासन और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन अमित पड़रिया एवं अजय अहिंसा ने किया।