दिल्ली। ऋषभोदय में विराजमान दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन को आदर्श और सार्थक बनाने के सूत्र बताए। महाराजश्री ने कहा कि व्यक्ति की सरलता ही उसकी पहचान और महानता का आधार बनती है। जीवन में संतुलन, मधुर वाणी, अनुशासन और क्षमाभाव को अपनाना आवश्यक है।

आदर्श बनने के लिए सरलता जरूरी

महाराजश्री ने कहा कि जीवन में ऊंचाइयां प्राप्त करने और आदर्श बनने के लिए सहजता एवं सरलता अत्यंत आवश्यक है। श्रेष्ठ बीज को उर्वरा भूमि में बोने पर ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुषों को श्रेष्ठ सज्जनों की संगति करनी चाहिए। जीवन में संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि व्यवहार, वाणी, भाषा और वेशभूषा में मधुरता होनी चाहिए। अनुशासनप्रिय, मधुरभाषी और क्षमावान व्यक्ति ही समाज के लिए आदर्श बन सकता है।

प्रेरक बनो, किसी को पेरो मत

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति को अच्छे कार्यों के लिए प्रेरक बनना चाहिए, लेकिन किसी पर अपने विचार थोपने नहीं चाहिए। जन-जन को सही दृष्टि और समीचीन सोच देने का प्रयास करें, ताकि वह स्वयं विचार कर सही निर्णय लेने में सक्षम बने।

उन्होंने कहा कि परिवर्तन भीतर से होना चाहिए। जब व्यक्ति स्वयं सही और गलत का निर्णय समझ लेता है, तभी उसके भीतर सही मार्ग पर चलने की जागृति आती है।

सत्य जानो, सत्य मानो

महाराजश्री ने कहा कि सत्य को जानना, सत्य को मानना और सत्य के मार्ग पर चलना जीवन को सुख और शांति प्रदान करता है। जो व्यक्ति यथार्थ सत्य को समझ लेता है, वह अनावश्यक विवाद और चिंता से दूर रहता है तथा जीवन में प्रसन्न रहना सीखता है।

पंथ नहीं, श्रेष्ठ पथ पर चलो

धर्मसभा में महाराजश्री का विशेष संदेश रहा—“पंथ मत बनाओ, पथ पर चलो।” उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-शांति प्राप्त करनी है तो नए पंथ और सम्प्रदाय बनाने के बजाय श्रेष्ठ एवं समीचीन पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पंथ और सम्प्रदाय के नाम पर हिंसा नहीं फैलानी चाहिए। मंजिल तक पहुंचने के लिए सम्यक पथ पर एक-एक कदम बढ़ाना आवश्यक है। धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देना है।

बदला मत लो, स्वयं को बदलो

महाराजश्री ने कहा कि किसी से बदला लेने के बजाय स्वयं में परिवर्तन लाना चाहिए। क्रोध से समस्या का समाधान नहीं होता, जबकि क्षमा शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। बदले का भाव शत्रुता को जन्म देता है।

उन्होंने कहा कि गुरुओं की वाणी सुनकर जीवन की उलझनों को समझना और सुलझाना चाहिए। दूसरों को बदलने का प्रयास करने के बजाय स्वयं को बदलना ही वास्तविक मानवता और धर्म है।

कण-कण में स्वतंत्र सत्ता

ब्रह्मरूप ब्रह्मांड की अवधारणा समझाते हुए महाराजश्री ने कहा कि जल, अग्नि, वनस्पति, पृथ्वी, वायु, मनुष्य, देव और तिर्यंच—सभी में जीव सत्ता विद्यमान है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड जीवों से युक्त है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक वस्तु की अपनी स्वतंत्र सत्ता है। कण-कण और अणु-अणु स्वतंत्र हैं। किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में समझना ही वस्तु-स्वरूप का ज्ञान है। “जो है, सो है”—इस वास्तविकता को समझना आवश्यक है।

धर्मसभा का संदेश

महाराजश्री के प्रवचन का मूल संदेश सरलता, सत्य, क्षमा, आत्मपरिवर्तन और सम्यक पथ पर चलने का रहा। उन्होंने समाजजनों को बाहरी प्रभाव के बजाय अपने गुणों को विकसित करने तथा स्वयं के आचरण से समाज के लिए उदाहरण बनने की प्रेरणा दी।