कुण्डलपुर (म.प्र.)। बड़े बाबा भगवान आदिनाथ की पावन नगरी कुण्डलपुर में शनिवार को दो दिवसीय जैन पाठशाला अधिवेशन-2026 का शुभारंभ हुआ। देशभर की करीब 170 पाठशालाओं के शिक्षक, शिक्षिकाएं, कार्यकर्ता और प्रतिनिधि अधिवेशन में शामिल हुए।
उद्घाटन सत्र में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि पाठशाला समाज निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने कहा, “पाठशाला एक टकसाल है। जैसे टकसाल में सिक्के ढलते हैं, उसी तरह पाठशाला में बच्चे ढलकर परिवार, समाज, धर्म और राष्ट्र के लिए अच्छे इंसान बनते हैं।”
लक्ष्य के साथ संस्कार भी जरूरी
मुनिश्री ने कहा कि बड़े लक्ष्य के लिए कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। बच्चों के निर्माण में माता-पिता, विद्यालय और पाठशाला के शिक्षक—तीनों की समान भूमिका होती है। यदि सभी का संकल्प बच्चों को संस्कारित बनाने का हो, तो समाज में बड़ा परिवर्तन संभव है।
उन्होंने कहा कि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज ने संस्कारित समाज का स्वप्न देखा था और देशभर में संचालित जैन पाठशालाएं उसी संकल्प को आगे बढ़ा रही हैं। पाठशाला की सफलता केवल धार्मिक पाठ याद कराने में नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन में नैतिकता, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास विकसित करने में है।
संस्कारी नागरिक भी पाठशाला की उपलब्धि
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि हर बच्चे का साधु-साध्वी बनना आवश्यक नहीं है। वह संस्कारी, जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनकर परिवार एवं समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करे, तो यह भी पाठशाला की बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने कहा कि पाठशालाएं बच्चों को धार्मिक ज्ञान देने के साथ मंच पर बोलने, प्रस्तुति देने और अपनी प्रतिभा विकसित करने का अवसर भी देती हैं। समाज को बच्चों की प्रतिभा पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए।
ज्ञान के मंदिर हैं पाठशाला और विद्यालय
मुनिश्री ने पाठशाला और विद्यालय को ज्ञान के मंदिर बताते हुए कहा कि मंदिर में भगवान के दर्शन होते हैं, जबकि ज्ञान के इन मंदिरों में भविष्य की दिव्यता लिए बच्चे बैठते हैं। जिनवाणी का अध्ययन तभी सार्थक है, जब व्यक्ति अपने स्वरूप को पहचानने लगे। गुरु चरणों का स्पर्श भी तभी सार्थक है, जब गुरु के आचरण का प्रभाव जीवन में दिखाई दे।
उन्होंने माता-पिता से करियर और शिक्षा के साथ बच्चों के संस्कारों पर भी ध्यान देने का आग्रह किया। कहा कि बच्चों को प्रतिभा विकसित करने के लिए खुला आकाश दें, लेकिन संस्कारों की डोर मजबूत रखें।
उद्घाटन और मार्गदर्शन
उद्घाटन अवसर पर बड़े बाबा भगवान आदिनाथ और आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज के चित्रों का अनावरण तथा दीप प्रज्वलन किया गया। बाल ब्रह्मचारी अनूप भैया, विदिशा और ब्रह्मचारी मनोज भैया, ललितपुर के निर्देशन में आचार्य गुरुदेव की पूजा संपन्न हुई।
ब्रह्मचारी भरत भैया, सागर और ब्रह्मचारी वीरेंद्र भैया, हीरापुर ने पाठशाला संचालन एवं व्यवस्थापन पर मार्गदर्शन दिया। मुनि श्री पवित्रसागर महाराज ने कहा कि अनेक साधु-साध्वी, आर्यिका और ब्रह्मचारी किसी न किसी रूप में पाठशाला से जुड़े रहे हैं। उन्होंने माता-पिता से बच्चों को पाठशाला से जोड़ने और शिक्षकों से निरंतर सीखते रहने का आग्रह किया।
सुधा मलैया सम्मानित
विशिष्ट अतिथि श्रीमती सुधा मलैया ने कहा कि बच्चों को धर्म का ज्ञान भय से नहीं, बल्कि तर्क, समझ और प्रेम के साथ दिया जाना चाहिए। कुण्डलपुर प्रबंधकारिणी समिति के महामंत्री आर.के. जैन एवं पदाधिकारियों ने शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति, पुरातत्व और जैन विरासत के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया।
दोपहर के सत्र में पाठशाला प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे। नन्ही देवरी पाठशाला के बच्चों ने सुंदर नाट्य प्रस्तुति दी। दादा राजाराम जी एवं बबीता दीदी का सम्मान किया गया। संध्या में समता समाधान कार्यक्रम संपन्न हुआ।
अधिवेशन के दूसरे दिन रविवार को पाठशाला संचालन, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यवस्थापन तथा बच्चों में संस्कार एवं धर्मबोध विकसित करने जैसे विषयों पर पुनः मंथन होगा।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई





