कुण्डलपुर (मप्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि कुण्डलपुर किसी एक व्यक्ति, संत अथवा परंपरा की निजी धरोहर नहीं है। यह संपूर्ण दिगंबर जैन समाज और राष्ट्र की अमूल्य धार्मिक विरासत है। प्रातःकाल बड़े बाबा मंदिर परिसर के सभामंडप में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने तीर्थ की प्राचीनता, साधना-परंपरा और आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डाला।

प्राचीन साधना परंपरा से जुड़ा है तीर्थ

मुनिश्री ने कहा कि हजारों वर्ष पुरानी बड़े बाबा भगवान आदिनाथ की विशाल प्रतिमा, प्राचीन जिनालय तथा यहां तप-साधना करने वाले संतों की परंपरा कुण्डलपुर की आध्यात्मिक गहराई को दर्शाती है। उन्होंने धार्मिक मान्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि इस भूमि पर अंतिम केवली श्रीधर स्वामी की साधना का प्रभाव भी जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि समय-समय पर इस क्षेत्र में मुनियों, आर्यिकाओं, आचार्यों, साधु-संतों और त्यागीव्रतियों ने भक्ति एवं तप किया है। इसलिए कुण्डलपुर को किसी एक नाम अथवा व्यक्तित्व तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।

आचार्य विद्यासागर जी की साधना से बनी विशेष पहचान

मुनि श्री समतासागर जी ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कभी कुण्डलपुर को अपना क्षेत्र नहीं माना। उनके जीवन में अपरिग्रह और अधिकार-विहीनता का भाव प्रमुख रहा। फिर भी श्रद्धालुओं की भावना में कुण्डलपुर की पहचान आचार्यश्री की दीर्घकालीन तप-साधना से गहराई से जुड़ गई है।

उन्होंने कहा कि आचार्यश्री के चातुर्मास, ग्रीष्म एवं शीतकालीन प्रवास, स्वाध्याय कक्षाएं, विद्वत संगोष्ठियां, दीक्षाएं और विविध धार्मिक अनुष्ठानों ने इस तीर्थ की चेतना को व्यापक बनाया। बड़े बाबा को भव्य सिंहासन पर विराजमान कराने तथा मंदिर की प्राचीनता और स्थापत्य परंपरा के संरक्षण में भी उनके योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

दर्शन से मिटती है यात्रा की थकान

मुनिश्री ने कहा कि दूर-दूर से आने वाले तीर्थयात्रियों के मन में यात्रा, निवास और व्यवस्थाओं को लेकर अनेक चिंताएं हो सकती हैं, किंतु बड़े बाबा के दर्शन के लिए सीढ़ियां चढ़कर मंदिर पहुंचते ही उनका मन भक्ति में डूब जाता है। ऐसे क्षणों में बाहरी असुविधाओं का स्मरण भी नहीं रहता।

उन्होंने अनुभूति का उदाहरण देते हुए कहा कि श्रद्धा से बड़े बाबा के दरबार में पहुंचने पर भक्त को ऐसा आध्यात्मिक अनुभव हो सकता है, मानो वह भगवान महावीर के समवसरण की पावन अनुभूति के निकट पहुंच गया हो।

जिनालय से प्रारंभ होती है आत्मयात्रा

मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक जिनालय को समवसरण की अनुभूति के केंद्र और प्रत्येक जिनबिंब को अरहंत भगवान के स्वरूप के रूप में श्रद्धापूर्वक देखना चाहिए। ऐसी भावना से की गई पूजा, भक्ति, पाठ और स्वाध्याय परिणामों को विशुद्ध बनाते हैं तथा सम्यग्दर्शन को निर्मल करने में सहायक होते हैं।

उन्होंने कहा कि कर्नाटक, बेंगलुरु, घाटोल, गुजरात, कोटा और देश के अन्य क्षेत्रों से आए श्रद्धालु बड़े बाबा के दरबार में एक ही भाव से जुड़ जाते हैं। यही दिगंबरत्व, जैन शासन और धर्म प्रभावना के प्रति समर्पण का स्वरूप है।

मुनिश्री ने कहा कि तीर्थ केवल मंदिरों का समूह नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहां बाहरी यात्रा समाप्त होकर आत्मयात्रा का आरंभ होता है।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर