जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने दुनिया को सत्य, अंहिसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्म्चर्य जैसे पांच सिद्धांत दिए। आइए आपको इन्हीं भगवान महावीर के जीवन से परिचित कराते हैं। पढ़िए प्रियंका संजय सेठी किशनगढ़ का विशेष आलेख ।
वर्तमान काल में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से आरम्भ हो कर 24 तीर्थंकरों की यह परम्परा भगवान महावीर पर आकर समाप्त होती है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य कुण्डलपुर में हुआ था। वर्धमान जो बाद में महावीर बने और विश्व को सत्य, अंहिसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्म्चर्य जैसे पांच सिद्धांत दिए। आइए आपको इन्हीं भगवान महावीर के जीवन से परिचित कराते हैं।
- भगवान महावीर का गर्भकल्याणकजैन पुराणों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल षष्ठी के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में कुंडलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला को रात्रि के पिछले पहर में उन्होंने ऐरावत हाथी सुन्दर बैल, सिंह, हाथियों द्वारा स्वर्णकलश, से अभिषिक्त होती हुई लक्ष्मी, दो पुष्प माला, पूर्णचन्द उदित होता हुआ सूर्य, दो स्वर्ण कलश, क्रीड़ासक्त दो मछलियां, सुन्दर सरोवर, समुद्र, सिंहासन, स्वर्ग विमान, नागेन्द्र भवन, रत्नराशि और धूम रहित अग्नि के सोलह स्वप्न देखे। उन्होंने महाराज सिद्धार्थ को इन स्वप्नों की जानकारी दी तो सिद्धार्थ ने हर स्वप्न का अलग-अलग अर्थ बताते हुए कहा कि तीन लोक के नाथ तुम्हारे गर्भ में आ गए हैं।
- भगवान महावीर का जन्माभिषेक महोत्सवचैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन माता त्रिशला ने पूर्व दिशा के सदृश अच्युतेन्द्र जीव को बालसूर्य रूप में जन्म दिया। सर्वत्र विश्व में आनन्द की एक लहर दौड़ गई। सौधर्म इन्द्र एक लाख योजन विस्तृत ऐरावत हाथी को सजाकर असंख्य देवों के साथ आये और नगरी की तीन प्रदक्षिणायें दीं। इन्द्र ने जिनबालक को ऐरावत हाथी पर विराजमान किया और सुमेरू पर्वत पर और क्षीरसागर के जल से भरे हुए 1008 कलशों से अभिषेक किया। इन्द्र ने उनके ‘वीर’ और ‘वर्धमान’ नाम रखे।
- भगवान महावीर का दीक्षा महोत्सवएक दिन भगवान को स्वयं ही आत्मज्ञान हो गया। उसी समय लौकांतिक देवों ने आकर भगवान् की स्तुति की। समस्त देवों ने आकर दीक्षा कल्याणक महोत्सव मनाया। भगवान् बंधुजनों से विदा लेकर ‘षण्ड’ नाम के वन में आए और दो दिन के उपवास का नियम लेकर विराजमान हो गए। मगसिर वदी दशमी के दिन भगवान् ने वस्त्र, आभूषण, माला आदि उतार कर फेंक दिए और केशलोंच किया। भगवान् निर्ग्रंथ दिगम्बर मुनि हो गए और मौन अवस्था में एकांत स्थानों, निर्जन वनों में तपस्या करने लगे।
-भगवान् महावीर का केवलज्ञान महोत्सवतपस्या करते हुए बारह वर्ष व्यतीत हो गए। वैशाख शुक्ला दशमी के दिन केवल ‘परमात्मा’ हो गए और पृथ्वी से पांच हजार धनुष (बीस हजार हाथ) ऊपर आकाश में सुशोभित होने लगे। सौधर्म इन्द्र ने आकर देवों के साथ समवशरण की रचना की और केवलज्ञान महोत्सव मनाया। समवशरण में बैठे असंख्य भव्यजीव भगवान् की दिव्यध्वनि सुनने के लिए उत्सुक थे लेकिन गणधर नहीं होने के कारण उनकी दिव्य ध्वनि नहीं खिरी। इन्द्र, इन्द्रभूति नाम के ब्राह्मण के पास वृद्ध ब्राह्मण का रूप लेकर पहुंच गया और शास्त्रार्थ किया तो ब्राह्मण ने सोचा इसके गुरु के पास ही चलकर वाद-विवाद करना चाहिये। समवशरण में पहुंचकर मानस्तंभ देखते ही इन्द्रभूति का मानगलित हो गया। ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए ये इन्द्रभूति गौतम मुनि बन गए और महावीर स्वामी के प्रथम गणधर हुए। महाराज श्रेणिक भगवान् के समवशरण के मुख्य श्रोता थे।
-भगवान महावीर का मोक्ष गमनअन्त में भगवान् पावापुर नगर में पहुंचे। वहां के ‘मनोहर’ नाम के वन के भीतर अनेक सरोवरों के बीच में शिला पर विराजमान हो गये। वे दो दिन तक वहां विराजमान रहे और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन रात्रि के अन्तिम समय स्वाति नक्षत्र में मोक्ष पर प्राप्त कर लिया। तभी से प्रतिवर्ष आदर पूर्वक प्रसिद्ध ‘दीप मालिका’ के द्वारा भगवान् महावीर की पूजा की जाती है।




