मोरटक्का। श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, औंकार बाग के वार्षिक धार्मिक उत्सव में कलशाभिषेक, विद्वत, तपस्वी एवं स्वर साधना सम्मान समारोह श्रद्धा और उत्साह से किया गया। निमाड़ के विभिन्न नगरों से सैकड़ों समाजजन सहभागी बने। विश्वशांति एवं विश्व कल्याण की मंगल भावना के साथ भगवान आदिनाथ की शांतिधारा एवं कलशाभिषेक किया गया। जुलूस के बाद महाआरती एवं भक्ति संध्या हुई। समाजजनों ने भक्ति भाव से सहभागिता करते हुए 108 दीपकों से भगवान आदिनाथ की आरती की। रायबहादुर सेठ औंकार कस्तूरचंदजी धार्मिक एवं पारमार्थिक संस्था की ओर से खंडवा के पुलिस अधीक्षक अगम जैन, जिला एवं सत्र न्यायाधीश दीपक चौधरी, मंडलेश्वर, सेवानिवृत्त डीएसपी डीके माला जैन, इंदौर, वन परिक्षेत्राधिकारी सृष्टि जैन, सनावद, बड़वाह के एलआईसी मैनेजर दीपक गोधा तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव प्रीति जैन, बड़वाह का गौरव सम्मान किया गया।
सम्मान प्रेरणा का माध्यम बने: अगम जैन
एसपी अगम जैन ने कहा कि जैन धर्म में मान-सम्मान की अपेक्षा का त्याग करने की भावना बताई गई है, लेकिन किसी व्यक्ति का सम्मान यदि दूसरों के लिए प्रेरणा का माध्यम बनता है तो उसका अपना महत्व है। उन्होंने छतरपुर में पदस्थापना के दौरान सिद्ध क्षेत्र के निकट रहने तथा वर्तमान में खंडवा जिले में सिद्धवरकूट सहित पावागिरि, ऊन एवं बावनगजा जैसे तीर्थों की निकटता का उल्लेख करते हुए निमाड़ को धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र बताया। कार्यक्रम समन्वयक राजेंद्र जैन महावीर ने कहा कि युवा आईपीएस अधिकारी अगम जैन कर्तव्यनिष्ठा और प्रतिबद्धता से कार्य कर रहे हैं। वे अपने दायित्वों के साथ जैन जीवन-मूल्यों का भी पालन करते हैं। ‘पुलिस की पाठशाला’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने समाज और युवाओं को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया है।
55 स्वर साधकों का सम्मान
स्वर साधना सम्मान के अंतर्गत बड़वाह के 14, महेश्वर के 5, मंडलेश्वर के 5, खंडवा के 12 तथा सनावद के 17 सहित 55 स्वर साधक-साधिकाओं एवं वाद्य कलाकारों का सम्मान किया गया। सनावद के प्रदीप पंचोलिया को लगभग 50 वर्षों से भजन गायन की साधना एवं सेवा के लिए ‘स्वर सम्राट’, संगीता महेंद्र पाटोदी को ‘कोकिलकंठी स्वर सम्राज्ञी’, पंकज जटाले को ‘स्वर सम्राट’, खंडवा के कांतिलाल जैन तथा बड़वाह के अशोक जैन को भी ‘स्वर सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। वाद्य संगीत के क्षेत्र में सेवाएं देने वाली जटाले ऑर्केस्ट्रा पार्टी का विशेष सम्मान किया गया। इस अवसर पर कलाकारों ने भक्ति गीतों की भावपूर्ण प्रस्तुति से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। राजेश, राकेश एवं रौनक काला परिवार, मोरटक्का की ओर से रजत शांतिधारा झारी संस्था को भेंट की गई।
विद्वानों एवं तपस्वियों का सम्मान
विद्वत सम्मान के अंतर्गत इंजीनियर पंडित दिनेश जैन, कमलेश शास्त्री, शुभम शास्त्री दिल्ली, ओजस जैन सांगानेर एवं वैभव जैन का सम्मान किया गया। पर्युषण पर्व के दौरान दस, पांच एवं तीन उपवास करने वाले साधकों तथा 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा निर्जल उपवास करने पर ट्रस्ट की ओर से उनका भी सम्मान किया गया। संत सिंगा जी गौशाला, मोगावां के लिए आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज का चित्र सरपंच ईश्वर बिरला एवं दुलीचंद दीवान को भेंट किया गया। मोटिवेशनल स्पीकर आलोक सेठी, खंडवा ने सामाजिक चिंतन रखते हुए कहा कि समय के साथ आवश्यक परिवर्तन स्वीकार करते हुए समाज को एकजुट रहना चाहिए और मनमुटाव को मन में गांठ बनाकर नहीं रखना चाहिए।
संस्था अध्यक्ष अमितकुमार सिंह कासलीवाल ने स्वागत भाषण दिया। मंगलाचरण एवं पूजन संगीता पाटोदी ने कराया तथा स्वागत गीत प्रदीप पंचोलिया ने प्रस्तुत किया। संचालन राजेंद्र जैन महावीर ने किया। संस्था मंत्री आशीष चौधरी ने सभी अतिथियों एवं निमाड़ के विभिन्न क्षेत्रों से आए समाजजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
सवा सौ वर्ष पुरानी औंकारबाग धर्मशाला: भवन नहीं, संस्कारों की जीवंत विरासत
औंकारबाग धर्मशाला की स्थापना सवा सौ वर्ष से अधिक पहले रायबहादुर सेठ औंकार कस्तूरचंद ने तीर्थयात्रियों की सुविधा एवं धर्मसेवा की भावना से कराई थी। उस समय आवागमन के साधन सीमित थे। औंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले जैन यात्री यहां ठहरते, भगवान आदिनाथ के दर्शन करते और इसके बाद सिद्धवरकूट की यात्रा के लिए आगे बढ़ते थे। उस समय धर्मशाला का निर्माण केवल एक भवन खड़ा करना नहीं था, बल्कि तीर्थयात्रियों के लिए आश्रय, सुविधा और धर्मलाभ की व्यवस्था करना था। परिसर में निर्मित भगवान आदिनाथ का मंदिर भी लगभग 125 वर्ष पुराना माना जाता है। प्राचीन मंदिर का स्वरूप आज भी इस स्थान की धार्मिक पहचान को बनाए हुए है।
कलशाभिषेक की परंपरा ने जोड़े रखा निमाड़
दशलक्षण धर्म के पश्चात पूर्णिमा के अवसर पर होने वाला कलशाभिषेक ओंकारबाग की पुरानी एवं विशिष्ट धार्मिक परंपरा है। पुराने समय में सनावद, बड़वाह, बेड़िया सहित निमाड़ के विभिन्न क्षेत्रों से समाजजन यहां पहुंचते थे। लोग अपने साथ भोजन लेकर आते और भगवान आदिनाथ के कलशाभिषेक में सहभागी बनते। यह धार्मिक अनुष्ठान के साथ समाज के सामूहिक मिलन का भी अवसर होता था। समय बदला, यात्राओं के साधन बदले और व्यवस्थाओं का स्वरूप भी बदला, किंतु कलशाभिषेक की परंपरा कायम रही। कासलीवाल परिवार ने इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया। अब समाजजनों के लिए स्नेहभोज की व्यवस्था भी की जाती है और आयोजन में वही आत्मीयता दिखाई देती है। परंपरा का स्वरूप बदला, किंतु उसकी आत्मा सुरक्षित रही।
कासलीवाल परिवार ने विरासत को माना धर्मसेवा का दायित्व
औंकारबाग धर्मशाला के संरक्षण एवं विकास में कासलीवाल परिवार की अनेक पीढ़ियों का योगदान रहा है। जैन रत्न स्व. देवकुमारसिंह कासलीवाल, डॉ. स्व.अजितकुमारसिंह कासलीवाल एवं युवा रत्न स्व. प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल ने इस धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विमला कासलीवाल, पुष्पाजी कासलीवाल, आदित्यकुमारसिंह कासलीवाल एवं अमितकुमारसिंह कासलीवाल सहित परिवार के अन्य सदस्यों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। परिवार की विशेषता रही कि पूर्वजों से प्राप्त इस संस्था को केवल संपत्ति के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि समाज की धरोहर और धर्मसेवा का माध्यम माना गया। संस्था के विकास में स्व. इंदरचंद चौधरी, सनावद ने स्व. देवकुमारसिंह कासलीवाल के साथ महत्वपूर्ण सहयोग दिया। वर्तमान में अमितकुमारसिंह कासलीवाल एवं आदित्यकुमारसिंह कासलीवाल के साथ आशीष चौधरी संस्था के कार्यों को आगे बढ़ाने में सहयोग कर रहे हैं।
तीन पीढ़ियों से काला परिवार की सेवा
औंकारबाग धर्मशाला की व्यवस्थाओं में काला परिवार की तीन पीढ़ियों की सेवा भी उल्लेखनीय है। सबसे पहले स्व. रूपचंदजी काला यहां प्रबंधन सेवा से जुड़े। इसके बाद उनके सुपुत्र राजेश काला एवं राकेश काला ने व्यवस्थाओं को संभाला और वर्तमान में रौनक काला भी पूरी तन्मयता से धर्मशाला की व्यवस्थाओं में योगदान दे रहे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह सेवा-परंपरा भी इस धार्मिक विरासत की निरंतरता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
नई पीढ़ी को विरासत और संस्कारों से जोड़ना उद्देश्य: आशीष चौधरी
संस्था मंत्री आशीष चौधरी ने कहा कि नई पीढ़ी को पूर्वजों की विरासत और संस्कारों से जोड़ना इस परंपरा का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसी कारण औंकारबाग धर्मशाला आज केवल पुरानी इमारत नहीं, बल्कि धर्म, सेवा और संस्कारों की जीवंत विरासत के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। लगभग दो दशकों से अधिक समय से कलशाभिषेक समारोह के संचालन से जुड़े राजेंद्र जैन महावीर ने कहा कि कासलीवाल परिवार के सदस्य अपने बच्चों सहित प्रत्येक वर्ष मोरटक्का पहुंचते हैं और धार्मिक आयोजनों में सहभागी बनते हैं। बच्चों को इन आयोजनों में साथ लेकर आना केवल पारिवारिक सहभागिता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को धर्म, संस्कार और पूर्वजों की सेवा-परंपरा से जोड़ने की प्रक्रिया है।
मुनिराजों के प्रवास से जुड़ी धार्मिक स्मृतियां
ओंकारबाग धर्मशाला का संबंध केवल तीर्थयात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं रहा। सनावद, बड़वाह एवं सिद्धवरकूट की ओर आने-जाने वाले अनेक दिगंबर मुनिराजों का यहां प्रवास भी होता रहा है। अनेक संतों ने यहां ठहरकर धर्मप्रभावना की है। आज भी यहां धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक कार्यक्रम एवं विवाह समारोह संपन्न होते हैं। इस प्रकार बदलते समय में भी यह परिसर समाज के लिए उपयोगी बना हुआ है।
प्राचीन स्वरूप सुरक्षित, सुविधाओं का विस्तार
आज सिद्धवरकूट तक सड़क मार्ग से पहुंचना अपेक्षाकृत सरल है। इसलिए मोरटक्का की धर्मशाला अब तीर्थयात्रा की अनिवार्य कड़ी भले न रही हो, लेकिन इसका धार्मिक एवं सामाजिक महत्व कम नहीं हुआ है। मंदिर का प्राचीन स्वरूप कायम रखते हुए जीर्णाेद्धार कार्य जारी है। धर्मशाला के कमरों को भी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप सुविधायुक्त बनाया जा रहा है, ताकि समाजजन आज भी कम खर्च में इसका लाभ उठा सकें। यहां संरक्षण का अर्थ केवल पुरानी दीवारों को बचाना नहीं, बल्कि पूर्वजों द्वारा स्थापित धर्मसेवा के उद्देश्य को आधुनिक सुविधाओं के साथ जीवित रखना है।
विरासत जो संस्कार बनकर जीवित है
मोरटक्का की ओंकारबाग धर्मशाला की कहानी केवल एक भवन की कहानी नहीं है। यह उस धार्मिक संस्कार की कहानी है जिसमें पूर्वजों ने बनाया, अगली पीढ़ी ने संभाला और वर्तमान पीढ़ी उसे आने वाली पीढ़ी के लिए संवार रही है। रायबहादुर सेठ औंकार कस्तूरचंद ने जिस भावना से तीर्थयात्रियों की सुविधा और धर्मसेवा के लिए धर्मशाला एवं मंदिर का निर्माण कराया था, उसी भावना को कासलीवाल परिवार ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा। कलशाभिषेक की परंपरा, समाज के प्रति आत्मीयता, मुनिराजों का प्रवास, धार्मिक आयोजन और धर्मशाला का निरंतर उपयोगकृये सभी इस विरासत के विविध आयाम हैं। ओंकारबाग की यही सबसे बड़ी पहचान है। विरासत यहां केवल सुरक्षित नहीं, बल्कि संस्कार बनकर जीवित है।




