इंदौर। दलाल बाग स्थित देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में जगत पूज्य मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज ने भक्ति, भगवान के स्वरूप और गुरु के प्रति समर्पण का मर्म समझाया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ने कहा कि पुण्य पुरुषों की प्रशंसा और अपनी निंदा करना ही भक्ति का स्वरूप है।
जिसकी भक्ति करो, उसमें दोष मत देखना
मुनिश्री ने कहा कि जिसकी भक्ति करो, उसमें दोष नहीं देखना चाहिए। यदि आराध्य में दोष देखने लगेंगे तो भक्ति खंडित हो जाएगी। जिस दिन आत्मा यह स्वीकार कर ले कि जिसकी आराधना कर रहे हैं, उसमें कोई दोष या दुर्गुण नहीं है, उसी दिन भक्ति सार्थक हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि जो 18 दोषों से रहित हैं तथा राग, द्वेष और कामादिक विकारों पर विजय प्राप्त कर चुके हैं, वही सच्चे भगवान हैं। ऐसे निर्दोष परमात्मा को ही भगवान मानकर उनकी भक्ति करनी चाहिए।
अपने भगवान पर दृढ़ श्रद्धा रखें
मुनिश्री ने कहा कि यदि सारा संसार भी यह कहे कि तुम्हारे भगवान में दोष है, तब भी अपनी श्रद्धा को डगमगाने नहीं देना चाहिए। भक्त को दृढ़ता से मानना चाहिए कि मेरे भगवान किंचित मात्र भी दोषयुक्त नहीं हैं। इसी श्रद्धा के साथ उन्हें नमोस्तु कर भक्ति करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आराध्य में वही दोष दिखाई देने लगें, जो स्वयं के भीतर हैं, तो उसे भगवान नहीं मानना चाहिए और न ही उसकी भक्ति करनी चाहिए।
जगत पूज्य ने बताए भक्ति और पुण्य के सूत्र
मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा में कई महत्वपूर्ण सूत्र बताए—
- सदोष को नमोस्तु नहीं किया जाता।
- पुण्यबंध साधु को आहार देने-कराने से ही नहीं, अपने घर में चौका लगाने से भी होता है।
- पुण्य पुरुषों और बड़े लोगों के सामने अपनी अच्छाई का बखान नहीं करना चाहिए।
- स्वयं को श्रेष्ठ प्रस्तुत करने का भाव छोड़ना चाहिए।
- भगवान में चमत्कार नहीं, उनकी भक्ति में चमत्कार है।
- गुरु, साधु और भगवान के समक्ष आशीर्वाद लेने के लिए नहीं, नमोस्तु करने के भाव से जाना चाहिए।
- सुखी होना चाहते हो तो पहले दुख को समझने और सहने का भाव विकसित करो।
- अपराधी वह है जिसे अपराध करने के बाद भी बरी होने का भाव बना रहता है।
गुरु के सामने दोष बताना ही सच्ची शिष्यता
मुनिश्री ने कहा कि गुरु का सच्चा शिष्य वही है, जो अपने अपराध और दोष को गुरु के सामने निसंकोच स्वीकार करता है। अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें पहचानना और गुरु के मार्गदर्शन में सुधारने का प्रयास करना ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भक्ति का सार आत्मशुद्धि
मुनि श्री के प्रवचनों का मूल संदेश यही रहा कि सच्ची भक्ति केवल बाहरी पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। आराध्य के प्रति निर्दोष श्रद्धा, पुण्य पुरुषों के प्रति सम्मान, स्वयं के दोषों का निरीक्षण और गुरु के प्रति विनय—ये सभी आत्शुद्धि एवं भक्ति को सार्थक बनाने वाले भाव हैं।



