मुनिश्री ने कहा कि जो जितना भक्ति में उछलता है वही उतनी ही ऊँचाई तक जाता है। भक्ति करने का रस अलग है। जिनशासन की प्रभावना कितने भी रुपों में कर सकते हैं। भक्ति के अनेकों रुप हैं। यह वीणा बजाकर, वाद्य बजाकर, ध्यान लगाकर कैसे भी की जा सकती है। भाक्ति की भाषा अन्तरंग की निर्मलता है। भाक्ति मस्ती में नहीं ,मस्त होकर की जाती है। उथले बैठोगे तो कोई आनंद नही आएगा। मन लगा कर बैठेगो तो आनंद आएगा।
भाक्ति से ही पुण्य का संचय होता है। भाक्ति से निधात्ति ,निकाचित कर्म नष्ट हो जाते है। मुनिश्री ने कहा कि महान कार्य करने वाला ही महान पुरुष होता है। पैसों की, विचारों की, शब्दों की कृपणता नहीं होनी चाहिए। जहाँ ये कृपणता आ गई वह उपवन नहीं खिलता। सबसे बड़ा कंगाल वही है जिसके पास वचनों की कृपणता है।
किसी को कुछ दे पाओं य न दे पाओ लेकिन अच्छे विचार विचार जरूर दे देना क्योंकि अच्छे विचार वाला ही महापुरुष बनता है। शुभ विचारों के द्वारा ही शुभ कार्य में प्रगति होती है। इस अवसर पर मंगलाचरण संघस्थ अलका दीदी, भारती दीदी ने किया। इस अवसर पर विशेष रूप से समाज मे अध्यक्ष प्रदीप पांड्या, मंत्री ललित सेठी, चातुर्मास संयोजक सुरेन्द काला के साथ बहुत से भक्त उपस्थित थे। मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन



