जयपुर। जनकपुरी ज्योतिनगर स्थित जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री 108 आदित्य सागरजी महाराज द्वारा जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ का प्रतिदिन प्रातःकाल सरल भाषा में स्वाध्याय कराया जा रहा है। आचार्यश्री प्रत्येक श्लोक के माध्यम से श्रावक के आचरण, धर्म और कर्तव्यों को सहज तरीके से समझा रहे हैं।

श्रावक जीवन का मार्गदर्शक ग्रंथ

‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ जैन धर्म का प्रसिद्ध एवं प्राचीन ग्रंथ है। इसकी रचना आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने की थी। ग्रंथ में गृहस्थ जीवन जीने वाले जैन श्रावक के आचरण, धर्म और पालन किए जाने वाले कर्तव्यों का 150 श्लोकों में सरल एवं सुंदर वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ गृहस्थ जीवन में धर्म के पालन, सदाचार और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

एक-एक श्लोक का सरल विवेचन

आचार्य श्री आदित्य सागरजी महाराज द्वारा ग्रंथ के प्रत्येक श्लोक को सरल भाषा में समझाया जा रहा है। स्वाध्याय के दौरान श्लोक के शब्दार्थ के साथ उसके भाव और जीवन में उपयोगिता को भी समझाया जाता है, जिससे श्रद्धालु जैन सिद्धांतों को व्यवहार से जोड़कर समझ सकें। बुधवार को श्लोक छह में वर्णित अठारह दोषों का विवेचन करते हुए आहार एवं भूख के विषय को विस्तार से समझाया गया। आचार्यश्री ने विषय को सहज उदाहरणों के माध्यम से श्रद्धालुओं के समक्ष रखा।

गुरु पूजन और मंगलाचरण से शुरुआत

प्रतिदिन होने वाले स्वाध्याय एवं प्रवचन का शुभारंभ गुरु पूजन एवं मंगलाचरण से होता है। इसके बाद ग्रंथ का स्वाध्याय कराया जाता है। कार्यक्रम का समापन जिनवाणी स्तुति के साथ होता है।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु ले रहे धर्मलाभ

आचार्य श्री के सान्निध्य में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के स्वाध्याय का लाभ ले रहे हैं। सरल भाषा में जैन धर्म के सिद्धांतों की व्याख्या किए जाने से श्रद्धालुओं में स्वाध्याय के प्रति विशेष रुचि दिखाई दे रही है।