दिल्ली। ऋषभ विहार में विराजमान दिगंबर जैनाचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “विचारों के अनुसार आचार” होता है। मनुष्य के विचार ही उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। विचार ही व्यक्ति को ऊपर उठाते हैं और विचार ही उसे नीचे गिराते हैं।

विचारों से बनता है आचरण

आचार्यश्री ने कहा कि विचार ही मनुष्य को आचरण की ओर प्रेरित करते हैं। विचारों से ही इंसान भगवान बनता है और विचारों से ही हैवान बनता है। विचारवान व्यक्ति ही सुख, समृद्धि और सफलता का अधिकारी बनता है। उन्होंने कहा कि आज के विचारों से ही कल का निर्माण होगा। आज मन में आने वाले विचार ही भविष्य में जीवन में साकार रूप लेते हैं। इसलिए विचारों को संभालना आवश्यक है। “विचारों को संभालो, जीवन संवर जाएगा।” आचार्यश्री ने कहा कि यदि आचरण पवित्र करना है तो विचारों को पवित्र करना होगा। मनुष्य की बाहरी गतिविधियों से पहले उसके भीतर के विचारों में परिवर्तन आवश्यक है।

धन नहीं, धर्म से जीवन धन्य

आचार्यश्री ने कहा कि आत्मशांति, आत्मसुख और आत्मानंद प्राप्त करना है तो धन-द्रव्य से दृष्टि हटाकर अपनी आत्मा पर दृष्टि टिकानी होगी। धन से जीवन धन्य नहीं होता, बल्कि धर्म से जीवन धन्य होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म को समझने, जानने और उसकी अनुभूति प्राप्त करने का आह्वान करते हुए कहा कि वास्तविक शांति धर्म के मार्ग पर चलने से ही प्राप्त होती है।

जगत का परिणमन स्वभाव से होता है

आचार्यश्री ने जैन दर्शन के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा कि “होता है स्वयं जगत परिणाम।” विश्व का कोई कर्ता या विनाशक नहीं है। जगत का परिणमन स्वमेव होता है। उन्होंने कहा कि सभी जीव एक-दूसरे से भिन्न हैं और प्रत्येक की अपनी सत्ता है। “मैं भिन्न हूं और जगत के जीव मुझसे भिन्न हैं।” व्यक्ति जैसा कर्मबंध करता है, उसी के अनुरूप उसे फल प्राप्त होता है।

भाव ही भव को बढ़ाते हैं

आचार्यश्री ने कहा कि भाव ही भववर्धक होते हैं। जैसे भाव होते हैं, उसी के अनुसार भव बढ़ते हैं और भाव ही आगामी भव प्रदान करते हैं। कोई किसी का कर्ता नहीं होता। प्रत्येक जीव अपने कर्म और परिणामों के अनुसार अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है।उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने भावों को निर्मल रखने और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को धर्म की दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा दी।

अनुशासन सफलता का मंत्र

आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में उन्नति चाहिए तो आत्मानुशासक बनना होगा। अनुशासनप्रियता ही मनुष्य को महान बनाती है। जो व्यक्ति अनुशासन का पालन करता है, वह सभी का प्रिय बन जाता है। उन्होंने कहा कि अनुशासन सिद्धि का साधन, सफलता का मंत्र, श्रेष्ठता की पहचान और आनंद का द्वार है। अनुशासन व्यक्ति की कुलीनता का भी चिह्न है।

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन जरूरी

आचार्यश्री ने विशेष रूप से विद्यार्थियों को अनुशासन का महत्व समझाते हुए कहा कि अनुशासन विद्यार्थी जीवन के लिए वरदान है। अनुशासनबद्ध जीवन व्यक्ति को उत्कर्ष की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन में प्रसन्नता और सफलता चाहते हैं तो अनुशासनप्रिय बनें। आत्मानुशासन के साथ जीवन जीने वाला व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता है।