मुरैना। जैन दर्शन केवल जीवन जीने की एक पद्धति अथवा किसी विशेष समुदाय की पहचान नहीं, बल्कि अनादि और शाश्वत आध्यात्मिक परंपरा है। यह अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और आत्मकल्याण जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित दर्शन है, जिसका मूल उद्देश्य प्रत्येक जीव के आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करना है। जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलता है। जैन परंपरा के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को व्यवस्थित जीवन, श्रम और आत्मसंयम की दिशा प्रदान की। उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत का भी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। जैन मान्यता के अनुसार देश का नाम ‘भारत’ उनके नाम से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टि से जैन परंपरा भारतीय संस्कृति के प्राचीन आध्यात्मिक प्रवाह से गहराई से जुड़ी हुई है। जैन धर्म का मूल संदेश ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ अर्थात जीवों का परस्पर उपकार है। अहिंसा को सर्वोच्च जीवन-मूल्य मानने वाला यह दर्शन आज के हिंसा और तनाव से भरे दौर में भी मानवता को करुणा, सह-अस्तित्व और संयम का संदेश देता है।

विडंबना यह है कि आधुनिक सामाजिक व्यवस्था में कई बार जैन को धर्म के बजाय जातिगत पहचान के रूप में देखा जाने लगता है। यह दृष्टिकोण जैन दर्शन की व्यापकता और मौलिकता को सीमित करता है। जाति सामाजिक, पारिवारिक अथवा वंशगत पहचान हो सकती है, जबकि धर्म व्यक्ति की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आस्था से संबंधित होता है।

जैन समाज में विभिन्न सामाजिक जातियां और उपसमूह पाए जाते हैं। खंडेलवाल, पोरवाल, मोदी, सिंघई, गोलछा, पटवारी सहित अनेक सामाजिक पहचानें जैन समाज के भीतर प्रचलित हैं। सामाजिक स्तर पर इनकी अलग पहचान हो सकती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इन सभी की मूल पहचान जैन धर्म से जुड़ी है।

इसी संदर्भ में आगामी राष्ट्रीय जनगणना को लेकर भी समाज में जागरूकता आवश्यक है। जनगणना प्रपत्र में धर्म और जाति से संबंधित जो भी आधिकारिक प्रावधान और विकल्प उपलब्ध हों, उन्हें समझकर प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वास्तविक धार्मिक एवं सामाजिक पहचान का सही उल्लेख करना चाहिए। यदि धर्म के लिए पृथक विकल्प उपलब्ध हो, तो जैन धर्मावलंबियों को अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से ‘जैन’ के रूप में दर्ज करानी चाहिए।

धार्मिक पहचान केवल नाम के पीछे ‘जैन’ लिख देने तक सीमित नहीं है। यह हमारे विचार, आचरण, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों से भी जुड़ी है। साथ ही, जहां सरकारी अथवा प्रशासनिक दस्तावेजों में धर्म की जानकारी दर्ज की जाती है, वहां अपनी वास्तविक धार्मिक पहचान को स्पष्ट रूप से अंकित कराना भी जागरूक नागरिकता का हिस्सा है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन समाज अपनी धार्मिक पहचान, गौरवशाली परंपरा और मौलिक सिद्धांतों के प्रति जागरूक बने। आने वाली पीढ़ी जैन धर्म को केवल किसी जाति अथवा सामाजिक समूह के रूप में नहीं, बल्कि अहिंसा, आत्मसंयम और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग बताने वाली एक स्वतंत्र एवं शाश्वत परंपरा के रूप में जाने- यही इस जागरूकता का उद्देश्य होना चाहिए।