कुण्डलपुर। मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि सुना जाता है कि पारस मणि के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, लेकिन पारस केवल वस्तु का मूल्य बदलता है,उसके स्वभाव को नहीं,लोहे की छुरी पारस के स्पर्श से सोने की छुरी बन जाए तो वह बहुमूल्य अवश्य हो जाती है, लेकिन उसका स्वरूप छुरी का ही रहता है। इसके विपरीत प्रभु और सद्गुरु ऐसे अद्भुत पारस हैं, जो व्यक्ति के जीवन को केवल बाहरी रूप से मूल्यवान नहीं बनाते, बल्कि उसके स्वभाव और जीवन की दिशा को ही बदल देते हैं। प्रातःकालीन प्रवचन श्रृंखला में मुनिश्री ने कहा कि धर्म और सद्गुरु का स्पर्श लोहे की छुरी को केवल सोने की छुरी नहीं, बल्कि सोने के छत्र के समान बना देता है। छत्र दूसरों को छाया प्रदान करता है और वर्षा से रक्षा करता है। इसी प्रकार धर्म से परिवर्तित व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी सुख, शांति और सुरक्षा का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि भगवान के मस्तक पर छत्र अर्पित करने के पीछे भी गहरी श्रद्धा और भावना निहित है। भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे स्वयं तीनों लोकों के नाथ हैं, किंतु श्रद्धापूर्वक भगवान के चरणों में की जाने वाली भक्ति भक्त के जीवन को सुरक्षित और मंगलमय बनाने का माध्यम बनती है। भक्ति भावों की शक्ति से अशुभ कर्मों का प्रभाव परिवर्तित होता है और जीवन में शुभ परिणामों का उदय होता है।
गुरुवर की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म और समदर्शी थी
मुनिश्री ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु की भक्ति अशुभ कर्मों को शुभ परिणामों की ओर परिवर्तित करने का उत्कृष्ट साधन है। सच्ची भक्ति केवल पूजा की क्रिया नहीं, बल्कि अपने जीवन को बदलने की साधना है। गुरुवर की समदृष्टि और दूरदर्शिता का प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने कहा कि वर्ष 1992 में पर्युषण पर्व के दौरान आर.के. मार्बल के अशोक पाटनी प्रतिवर्ष की तरह कुण्डलपुर आए थे। किसी आकस्मिक कारण से उन्हें बीच में ही जाना पड़ा। उनके मन में आचार्य श्री को आहार देने और आशीर्वाद लेकर प्रस्थान करने की भावना थी। उस समय आचार्य श्री के चौके में अत्यधिक भीड़ थी और अनेक श्रद्धालु अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। भीड़ अधिक होने के कारण उस समय आचार्य श्री ने आहार ग्रहण नहीं करने का निर्णय लिया। कार्यकर्ताओं ने अशोक पाटनी को आगे पहुंचा दिया, किंतु आचार्य श्री ने उनसे भी तत्काल आहार ग्रहण नहीं किया। कुछ समय बाद आचार्य श्री ने वहां पहले से प्रतीक्षा कर रहे श्रद्धालुओं से आहार ग्रहण किया और उसके बाद अशोक पाटनी से आहार लिया। मुनिश्री ने कहा कि गुरुवर की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म और समदर्शी थी।वे नहीं चाहते थे कि किसी भी श्रद्धालु के मन में यह भावना आए कि किसी बड़े व्यक्ति को विशेष अवसर दिया गया और सामान्य श्रद्धालुओं की उपेक्षा हुई।
अपने गुरुवर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें
मुनिश्री ने कहा कि गुरुवर की करुणा, स्नेह, वात्सल्य, विनम्र वाणी, मृदु व्यवहार और सभी के प्रति समान दृष्टि ही उनकी महानता का परिचायक थी। उनके पास आने वाला व्यक्ति भले ही भौतिक रूप से कुछ लेकर न जाए, लेकिन गुरुवर के सान्निध्य से आत्मिक रूप से समृद्ध और मालामाल होकर लौटता है। उन्होंने कहा कि ऐसे ही गुरुवरों की प्रेरणा, करुणा और प्रभावना से कुण्डलपुर जैसे महान् तीर्थों का वैभव और धर्म की प्रभावना निरंतर बढ़ रही है। हम सभी को अपने गुरुवर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके उपदेशों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
पुरुषार्थ हो तो परमात्मा का मार्ग कभी दूर नहीं
प्रवचन के अंत में मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा-आंखों में अगर अरमान है तो जहां तुमसे दूर नहीं, पंखों में अगर उड़ान है तो आसमान तुमसे दूर नहीं।
मंदिर के शिखर पर बैठकर पक्षी ने यह गीत गाया-
श्रद्धा में अगर जान है तो भगवान तुमसे दूर नहीं।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सच्ची श्रद्धा, दृढ़ विश्वास और पुरुषार्थ हो तो परमात्मा का मार्ग कभी दूर नहीं होता। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः अभिषेक एवं शाँतिधारा के पूर्व श्रद्धालुओं को प्राप्त हो रहे हैं।
कुण्डलपुर क्षेत्र प्रबंधकारिणी कमेटी की बैठक संपन्न हुई
कुंडलपुर कार्यालय सभागार में प्रबंधकारिणी कमेटी की बैठक चंद्रकुमार सराफ अध्यक्ष की अध्यक्षता में आयोजित हुई।बैठक में पिछली बैठक की कार्यवाही का वाचन, अनुमोदन कर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ससंघ सानिध्य में पर्वराज दशलक्षण महापर्व 16 से 25 सितंबर तक आयोजित होने वाले संस्कार शिविर के संबंध में चर्चा कर निर्णय लिए गए। संस्कार शिविर का प्रभारी संजय कुबेर पथरिया को बनाया गया। कुण्डलपुर क्षेत्र पर द्रुतगति से चल रहे निर्माण कार्यों की जानकारी से सदन को अवगत कराया गया। बड़े बाबा धर्मशाला में 51 फ्लैट का निर्माण एवं श्रीधर केवली धर्मशाला में 180 कमरों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। बड़े बाबा मंदिर निर्माण कार्यों की जानकारी देते हुए निर्माण समिति के अमर सेठ ने बताया कि सिंहद्वार जिसकी ऊंचाई 56 फीट तक जानी है 14 फिट कार्य हो चुका है ।बड़े बाबा मंदिर बाहर साफ सफाई घिसाई का कार्य पूर्ण होकर 29 तोरण लग चुके हैं। रूपकाम 358 मूर्तियां पूर्ण होकर शेष कार्य चल रहा है। प्रशस्ति का कार्य, शीशम के दरवाजे का कार्य चालू है। जगती 15 फुट चौड़ा बरामदा परिक्रमा पथ तैयार होना है। मान स्तंभ परिसर के पास विद्यासागर निलय जिसमें साधक आश्रम, साधिका आश्रम, उदासीन आश्रम की कार्य योजना बनकर शीघ्र कार्य प्रारंभ किया जाएगा ।बावड़ी के पास स्थित पुराने आश्रम का निष्ठापन कर कार्य योजना तैयार कर आर्यिका निलय का निर्माण होगा। बैठक में बड़ी संख्या में पदाधिकारी सदस्यों की उपस्थिति रही।




