गींगला (सलूम्बर)। पर्युषण पर्व के सातवें दिन आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर एवं दिगंबर जैन समाज के नौहरे के पांडाल में उत्तम तप धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की गई। प्रातः 6 बजे से सभी वेदियों में विराजमान भगवान का अभिषेक हुआ। इसके बाद पांडाल में विराजित विधिनायक आदिनाथ भगवान का फलों के रसों सहित पंचामृत अभिषेक संपन्न हुआ।
गणिनी आर्यिका श्री 105 प्रसन्नमति माताजी के सान्निध्य में प्रतिदिन विविध धार्मिक कार्यक्रम धर्मप्रभावना के साथ आयोजित किए जा रहे हैं।
तप से होती है कर्मों की निर्जरा
आर्यिका प्रसन्नमति माताजी ने उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि दान, पुण्य और धर्मध्यान के साथ पूर्वोपार्जित कर्मों की निर्जरा के लिए तप आवश्यक है। कर्मों को या तो उनके फल के रूप में भोगना पड़ता है अथवा तप के माध्यम से उनकी निर्जरा का पुरुषार्थ करना होता है।
उन्होंने कहा कि तप कर्मों की कठोर चट्टानों को तोड़ने वाले वज्र के समान है। तप बारह प्रकार के होते हैं—छह बाह्य तप और छह आंतरिक तप। इन तपों की साधना से आत्मा को पवित्र और निर्मल बनाया जा सकता है।
केवल भूखे रहना उपवास नहीं
माताजी ने कहा कि मात्र भोजन न मिल पाने अथवा कार्य की व्यस्तता के कारण भूखे रह जाना उपवास नहीं है। जब खाने-पीने की सामग्री उपलब्ध होते हुए भी ज्ञानपूर्वक भोजन का त्याग कर आत्मा में रमण किया जाता है, तभी वह वास्तविक उपवास कहलाता है।
उन्होंने सोने का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मिट्टी से शुद्ध सोना प्राप्त करने के लिए उसे बार-बार तपाया जाता है, उसी प्रकार बाह्य और आंतरिक तप के माध्यम से आत्मा को शुद्ध किया जा सकता है।
पुण्यार्जक परिवार
आज की शांतिधारा का सौभाग्य छोगालाल-विनोद कुमार-रंजना-नरेंद्र-मयूर बंबोरिया परिवार को प्राप्त हुआ। आज के सौधर्म इंद्र शांतिलाल गणावत तथा सची इंद्राणी जयश्री देवी ने सभी मांगलिक धर्मक्रियाएं संपन्न कीं।
आर्यिका माताजी को जिनवाणी भेंट, पाद प्रक्षालन एवं अर्घ्य समर्पण का सौभाग्य खेमराज-सवागी बाई, पुत्र नरेंद्र (न्यालचंद) मालवी परिवार को मिला।
श्रीफल साथी : अशोक कुमार जेतावत, धरियावद




