ये आंखे पूजनीय, वंदनीय है, चमत्कारी हैं, जिस पर उठ जाएंगी उसका भी भला होगा-मुनिश्री सुधासागर जी महाराजः श्रावकों को धर्मोपदेश दे जीवन के सत्य और कर्म के महत्व को समझाया

निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज सागर में विराजित हैं। यहां पर वे जैन समाज के श्रावकों को धर्मोपदेश देकर जीवन के सत्य और कर्म के महत्व को समझा रहे है। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर...
सागर। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज सागर में विराजित हैं। यहां पर वे जैन समाज के श्रावकों को धर्मोपदेश देकर जीवन के सत्य और कर्म के महत्व को समझा रहे है। इसी तरह मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जन्म और मरण के बीच के जीवन को यदि आनंदमय बना लिया जाए तो मरण भी महोत्सव हो जाता है। जन्म और मरण बिगाड़ने वाला जीवन है, जीवन की जो स्थितियां बनती है वह हमारे हाथ में है। लोग जन्म को समझते हैं, इसलिए जन्म दिवस मनाते हैं और मरण को समझते हैं इसलिए पुण्यतिथि मनाते हैं लेकिन, जीवन का महोत्सव मनाओ, ये सबसे बडी चीज है।मनुष्य और तिर्यंच के मरण का समय निश्चित नहीं जन्मदिवस की खुशी अधिकतम 24 घंटे रहती है और मृत्यु की खुशी मनाने का तो सवाल ही नहीं। मरण की तिथि को पुण्यतिथि इसलिए कहते है कि मर तो गया ही, पर भावना भाए कि वो तो स्वर्ग गया है, अच्छी तरह मरा है। शास्त्रों में कहा है कि जो व्यक्ति अपने मरण को पुण्यतिथि मान लेता है, वह व्यक्ति संसार में 2-3 भव से ज्यादा नहीं ठहरता। खुशी की लहर दौड़ जाए कि मैं कितना महान हूं कि मुझे मरने की तिथि मिल गई। मात्र तीन स्थानों पर ही मरने का पता चलता है, नरकों में, देवों में और भोग भूमि में, बाकी जितने भी मनुष्य और तिर्यंच हैं, इनके मरने का कोई समय निश्चित नहीं है।पापों को सुधारने का मौका मिला तुम सम्यक दृष्टि हो या मिथ्यादृष्टि, आसन्न भव्य हो या दुरानुदूर भव्य, मौत सुनते ही कैसा लगा, यदि यह लगे कि मैं भाग्यशाली हूं जिसे मरने का पता चल गया, अब मुझे जिंदगी में किए हुए पापों को सुधारने का मौका मिल गया है। इतना अनुभव में आ गया तो समझना आपने खुद अपने मरने की तिथि को पुण्यतिथि बना दिया। हमारे मरने का दिवस अशुभ या काला दिवस न माना जाए, यही तो महान व्यक्ति की विशेषता है।गरीब की मदद करना ही श्रेयस्कर मानतुंग स्वामी ने खोज की कि जिस व्यक्ति की संगति में गरीब व्यक्ति जाए और वह अपने समान बना लेे वहीं नगर सेठ है। किसी ने यह भाव बना लिया कि मैं धन से खुश नहीं हूं। मैं अपने आप को धनी तभी मानूंगा जब कोई निर्धन मेरी संगति में आए और मैं उसको भी धनी बना दूं तब मैं स्वयं को धनवान मानूंगा। तुम धनवान हो इसका नाम मद नहीं है, तुम दूसरे को तुच्छ समझ रहे हो, इसका नाम मद है।किसी के काम आना सबसे महत्वपूर्ण गुण हर व्यक्ति देखते ही सोचता है कि यहां मेरे लायक क्या है तो यह तो पशु-पक्षी भी सोचते हैं लेकिन सम्यक दृष्टि सोचता है कि मैं किसी के काम का हूं या नहीं, यदि ये परिणाम तुम्हारे अंदर आना शुरू हो गया। समझ लेना तुम्हारा जो पुण्य है। वह दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा, तुम्हें एक दिन तीर्थंकर और भगवान बना देगा। कैसे बन जाते हैं ये तीर्थंकर, मात्र एक गुण होता है, उनके मन में एक ही बात चलती रहती है, मैं किसी के काम आ जाऊं। साधु चलते समय सोचता है कि मेरी आंखें बहुत अच्छी हैं, ये तुच्छ जीवों को भी बचाने के काम आ जाए, बस ये आंखे पूजनीय, वंदनीय है, चमत्कारी हैं, ऐसी आंख जिस पर उठ जाएगी, उसका भी बेड़ा पार हो जाएगा।किसी का बुरा न हो ऐसा बोलिए इसी तरह ये कान हमें इसलिए नहीं चाहिए कि हमें जिनवाणी सुनना है क्योंकि, मुझे तो वह आत्मतत्व की प्राप्ति हो गई। जिसके लिए सुना जाता है, बस मुझे कानों में ताकत इसलिए चाहिए कि मैं किसी दुःखी की आवाज सुन सकूं। साधु बोलने के लिए आवाज नहीं चाहता क्योंकि जब नहीं बोलता तब ज्यादा साधना होती है। क्यों तुम साधु की वाणी सुनना चाहते हो क्योंकि, साधु एक ही साधना करता है इस मुख से जो भी निकले उससे किसी का विनाश न हो।यह है आहार का महत्व साधु कभी अपने आहार के संबंध में सच नहीं बताता। अतः जो भोजन तुम अपने लिए बनाते हो उसी में से साधु को भोजन कराने के लिए इसलिए कहा ताकि आपको पता चलेगा कि आज महाराज का आहार कैसा हुआ है? लौकी कड़वी थी या मीठी। साधु को भोजन करने के बाद घर के सभी सदस्यों ने वो भोजन किया है, तभी आहार का पुण्य लगेगा और मात्र महाराज को कराया है तो उद्दिष्ट का दोष आएगा।भावना का महत्व समझिए छोटा व्यक्ति बड़ों से अपना समाधान करता है तो कोई दोष नहीं लेकिन, बाद में व्यक्ति अपने छोटों से समाधान करता है तो दासी दास का दोष आएगा। शिष्य गुरु से अपनी समस्या दूर करा सकता है लेकिन गुरु शिष्य से अपनी समस्या दूर नहीं करा सकते। साधु के पैरों का ही गंधोदक क्यों बनता है क्योंकि, साधु ने पैरों में भावना भारी है कि मैं जब भी चलूं, मेरे पैरों से हर जीव की सुरक्षा होना चाहिए।पुरुषार्थ जीवन में जरूरी दो तरह के पुरुषार्थ हैं। यदि तुम्हारी जिंदगी में मात्र एक ही है कि दुनिया में मेरे काम की क्या चीज है तो एकेंद्रीय और आप में कोई अंतर नहीं, यदि आप सम्यक दृष्टि और जैन हैं, गुरु भक्त हैं तो आप एक ही भाव करोगे कि आहार तो मुझे करना है, इच्छा पूर्ति तो करोगे लेकिन, कैसे करोगे-सामने वाले का भी अहित न हो और मेरा भी काम हो जाए।साधु तो तृषा को जीतेगा साधु तो तृषा को जीतेगा लेकिन, तुम तो तड़फ जाओगे न, पानी तो पीना है लेकिन, ऐसा क्या करे कि इनके आश्रित जीवों की रक्षा हो जाए और मेरी भी प्यास बुझ जाए तो तुरंत छन्ना लगाकर छान लेगा, ये है जैनी की इच्छा, उस समय तुम स्वयं को अकाल मौत से बचा रहे हो, आगे जाकर तुम पूरी जिंदगी जिओगे। वो कहता है मैं भूख तो मिटाऊंगा लेकिन, किसी जिंदगी मिटाकर नही खाऊंगा।
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