दिल्ली। धर्म को बताया सुख-शांति का आधार दिल्ली के ऋषभोदय, ऋषभ विहार में विराजित दिगम्बर जैन तीर्थ-संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए धर्म को जीवन का सर्वश्रेष्ठ आधार बताया। उन्होंने कहा कि ही सुख का साधन, मंगल का स्वरूप, उत्तम मार्ग और शरण है। धर्म ही सुख-शांति तथा सद्गति का साधन है।
पुण्य बढ़ाने के बताए सूत्र
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने कहा कि पुण्य महाशक्ति और महाबल है। पुण्य वरदान के समान है तथा कामधेनु और कल्पवृक्ष के समान उपकारी है। मनुष्य को पुण्य बढ़ाने के लिए भगवान की भक्ति करनी चाहिए, सच्चे गुरुओं की सेवा करनी चाहिए और सद्साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।
उन्होंने प्राणियों के प्रति दया-करुणा रखने, सत्य-अहिंसा पूर्वक जीवन जीने तथा मुनियों और तपस्वियों को आहार एवं औषधि दान करने की प्रेरणा दी।
योग्यता बढ़ाओ, सफलता पाओ
गुरुदेव ने कहा कि व्यक्ति को निरंतर अपनी योग्यताएं बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति योग्य होता है, उसे योग्य पद समय पर स्वयं प्राप्त हो जाता है। जहां योग्यता होती है, वहां सफलता शीघ्र फलित होती है।
उन्होंने कहा कि योग्य व्यक्ति को ही योग्य पद प्रदान करना चाहिए। अयोग्य व्यक्ति को उच्च पद प्राप्त हो भी जाए तो वह उसे संभाल नहीं पाता। सफलता प्राप्त करनी है तो पहले योग्यता हासिल करनी होगी, क्योंकि योग्यता ही उच्चता प्रदान करती है।
सल्लेखना समाधि को बताया आध्यात्मिक साधना
सल्लेखना-मृत्यु के विषय में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने कहा कि कषाय के वशीभूत होकर विष सेवन, पानी में डूबना या फांसी लगाना अपघात है। इसके विपरीत जीवन के अंतिम समय में आत्मकल्याण की भावना के साथ, उपचार से असाध्य रोग, उपसर्ग, अकाल या अन्य अपरिहार्य मृत्यु-कारण उपस्थित होने पर सल्लेखना पूर्वक प्राण त्यागना समाधि है।
उन्होंने कहा कि जैनधर्म में जन्म के साथ-साथ सल्लेखना पूर्वक समाधि को भी आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना गया है।
मृत्यु से भयभीत न होने का संदेश
गुरुदेव ने कहा कि मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए। मृत्यु आत्मा का अंत नहीं, बल्कि भव और देह का परिवर्तन है। जिस प्रकार मनुष्य नए वस्त्र प्राप्त होने पर पुराने वस्त्रों को छोड़ देता है, उसी प्रकार धर्मात्मा और साधुजन जीवन के अंत समय में देह को छोड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि मृत्यु नवीन भव प्रदान करने वाली है, इसलिए आत्मा की शाश्वतता को समझते हुए मृत्यु के प्रति सम्यक दृष्टि रखनी चाहिए।
गुरु और जिनवाणी के सान्निध्य का महत्व
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने कहा कि जहां गुरु का स्मरण हो, गुरुवाणी गूंज रही हो, प्रभु का बिंब विराजित हो, सिद्धांत और शास्त्र उपलब्ध हों तथा यतियों का समूह उपस्थित हो, वहां यदि किसी भव्य जीव की मृत्यु होती है तो उसकी उत्तम गति का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने धर्म, गुरु, जिनवाणी और आत्मकल्याण की भावना को जीवन में निरंतर बनाए रखने की प्रेरणा दी।
धर्ममय जीवन का आह्वान
धर्मसभा में गुरुदेव के संदेश ने श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा दी कि धर्म को केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन के आचरण में उतारा जाए। पुण्य वृद्धि के साथ योग्यता, संयम, सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मकल्याण की भावना को जीवन का आधार बनाया जाए।



